हिंदी अर्थ सहित कबीर जी के दोहे प्रेरणादायक दोहे
कबीर पानी हौज की, देखत गया बिलाय ।
ऐसे ही जीव जायगा, काल जु पहुँचा आय ॥
कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजदीक ।
कान पकरि के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक ॥
कै खाना कै सोवना, और न कोई चीत ।
सतगुरु शब्द बिसारिया, आदि अन्त का मीत ॥
हाड़ जरै जस लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास ।
सब जग जरता देखि करि, भये कबीर उदास ॥
आज काल के बीच में, जंगल होगा वास ।
ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास ॥
ऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार ।
रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार ॥
पाव पलक की सुधि नहीं, करै काल का साज ।
काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज ॥
आछे दिन पाछे गये, गुरु सों किया न हैत ।
अब पछितावा क्या करे, चिड़िया चुग गई खेत ॥
आज कहै मैं कल भजूँ, काल फिर काल ।
आज काल के करत ही, औसर जासी चाल ॥
कहा चुनावै मेड़िया, चूना माटी लाय ।
मीच सुनेगी पापिनी, दौरि के लेगी आय ॥
सातों शब्द जु बाजते, घर-घर होते राग ।
ते मन्दिर खाले पड़े, बैठने लागे काग ॥
ऊँचा महल चुनाइया, सुबरदन कली ढुलाय ।
वे मन्दिर खाले पड़े, रहै मसाना जाय ॥
ऊँचा मन्दिर मेड़िया, चला कली ढुलाय ।
एकहिं गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय ॥
ऊँचा दीसे धौहरा, भागे चीती पोल ।
एक गुरु के नाम बिन, जम मरेंगे रोज ॥
पाव पलक तो दूर है, मो पै कहा न जाय ।
ना जानो क्या होयगा, पाव के चौथे भाय ॥
मौत बिसारी बाहिरा, अचरज कीया कौन ।
मन माटी में मिल गया, ज्यों आटा में लौन ॥
घर रखवाला बाहिरा, चिड़िया खाई खेत ।
आधा परवा ऊबरे, चेति सके तो चेत ॥
हाड़ जले लकड़ी जले, जले जलवान हार ।
अजहुँ झोला बहुत है, घर आवै तब जान ॥
पकी हुई खेती देखि के, गरब किया किसान ।
अजहुँ झोला बहुत है, घर आवै तब जान ॥
पाँच तत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम ।
दिना चार के कारने, फिर-फिर रोके ठाम ॥
कहा चुनावै मेड़िया, लम्बी भीत उसारि ।
घर तो साढ़े तीन हाथ, घना तो पौने चारि ॥
यह तन काँचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ ।
टपका लागा फुटि गया, कछु न आया हाथ ॥
कहा किया हम आपके, कहा करेंगे जाय ।
इत के भये न ऊत के, चाले मूल गँवाय ॥
जनमै मरन विचार के, कूरे काम निवारि ।
जिन पंथा तोहि चालना, सोई पंथ सँवारि ॥
1. कबीर पानी हौज की, देखत गया बिलाय।
ऐसे ही जीव जायगा, काल जु पहुँचा आय।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जैसे एक बिल्ली पानी के हौज में अपनी परछाई देखती है और उसे पकड़ने की कोशिश करती है, वैसे ही जीवात्मा संसार में भ्रमित रहती है। अंत में, काल उसे अपने साथ ले आता है।
2. कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजदीक।
कान पकरि के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जब काल नजदीक आता है, तो गाफिल व्यक्ति क्या कर सकता है? वह उसे पकड़कर ले जाता है, जैसे शिकारी अपने शिकार को पकड़ता है।
3. कै खाना कै सोवना, और न कोई चीत।
सतगुरु शब्द बिसारिया, आदि अन्त का मीत।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि खाने और सोने के अलावा और कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। यदि हम सतगुरु के शब्द को भूल जाते हैं, तो हम अपने आदि और अंत के मित्र को भूल जाते हैं।
4. हाड़ जरै जस लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास।
सब जग जरता देखि करि, भये कबीर उदास।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हड्डियां लकड़ी की तरह सड़ती हैं, और बाल घास की तरह झड़ते हैं। जब उन्होंने देखा कि सारा संसार सड़ रहा है, तो वे उदास हो गए।
5. आज काल के बीच में, जंगल होगा वास।
ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि आज के समय में, जंगल में रहने वाले लोग बाहर आकर हल चलाएंगे, और जानवर घास चरेंगे। यह समय का परिवर्तन है।
6. ऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार।
रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि उजड़े हुए घरों की टेकरी पर कुम्हार अपने बर्तन लेकर जाते हैं। रावण की तरह, लंका का सरदार भी चला गया। यह संसार की नश्वरता को दर्शाता है।
7. पाव पलक की सुधि नहीं, करै काल का साज।
काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि पांव और पलक की सुधि नहीं रहती, क्योंकि काल अपना जाल बिछाता है। काल अचानक हमला करता है, जैसे बाज तीतर पर हमला करता है।