आराम के साथी क्या-क्या थे जब वक्त पड़ा भजन

आराम के साथी क्या-क्या थे जब वक्त पड़ा भजन


आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं
सब लोग हैं अपने मतलब के,
दुनिया में किसी का कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं...

1.
जब पैसा हमारे पास में था,
तब दोस्त हमारे लाखों थे
जब वक्त पड़ा था मुश्किल का,
तब पूछने वाला कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं
सब लोग हैं अपने मतलब के,
दुनिया में किसी का कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं...

2.
माँ-बाप, तिरिया और पुत्रवधु,
मतलब के हैं सब ही नाते
जब हँसने वाले लाखों थे,
अब रोने वाला कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं
सब लोग हैं अपने मतलब के,
दुनिया में किसी का कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं...

3.
कल बाग़ जो था फूलों से भरा,
इठलाती हुई चलती थी हवा
उस सम्बुल-गुल का ज़िक्र क्या,
है ख़ाक, दरेबा कुछ भी नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं
सब लोग हैं अपने मतलब के,
दुनिया में किसी का कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं...

4.
ए बिंदु क्यों नाहक रोता है,
तू होगा फ़ना इस बाग़ में कल
रोना तेरा बेकार है सब,
मिट्टी में भरोसा कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं
सब लोग हैं अपने मतलब के,
दुनिया में किसी का कोई नहीं।।

आराम के साथी क्या-क्या थे,
जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं...


गजेंद्र निवास राव ने गाया बहुत ही प्यारा भजन !! आराम के क्या क्या साथी थे | Aaram Ke Kya Sathi The

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आस-पास के सहचर और रिश्ते जब तक लाभ और सुविधा देते हैं, तब तक वे साथ निभाते हुए दिखते हैं; पर संकट आने पर वही चेहरे बदल जाते हैं। उपस्थिति का मूल्य अक्सर उस समय तक मापा जाता है जब चीजें सुचारु चल रही हों; कठिनाई में वही संबंध आधुनिकीकरण और स्वार्थ की झलक दिखाते हैं। इससे अनुभव होता है कि संसार में अनेक संबंध सतही होते हैं, और उनकी निष्ठा परिस्थिति पर टिकी रहती है।

धन की उपलब्धता ने भी लोगों को बाँध रखा था; मौजूदगी के बहाने दोस्ती की झलक थी, पर जब आर्थिक सहारा कमजोर हुआ तो वे द्वार पीछे मुड़े। यह समझना कड़वा है कि कुछ साथियाँ सिर्फ सुविधा के लिए थीं, और संकट में सच्चे सम्बंध छाँटकर अलग दिखते हैं। यही वे सबक हैं जो बतलाते हैं कि निर्भरता के असल स्रोत को पहचानना ज़रूरी है—क्योंकि बाहरी सहारा छूट सकता है पर भीतरी आत्म‑बल और आत्म‑विश्वास कायम रहना चाहिए। 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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