भजन कर अंत सवारों रे

भजन कर अंत सवारों रे

हो ले कटार है काल खड़ा अब,
धर कर वेश कसाई,
कर्म का सारा लेखा जोखा,
लेगा पाई पाई।

एक जुगत है बचने की,
हरि नाम पुकारो रे,
भजन कर अंत संवारो रे,
अंत संवारो रे।

हो अंत सँवारो रे,
भजन कर अंत सँवारो रे।
   
करके सुमिरन अपने हरि का,
जीवन संवारों रे,
भजन कर अंत संवारो रे।

बचपन खोया नादानी में,
और जवानी माया में,
जीवन सारा बीत गया,
ये नश्वर तन चमकाने में।

शेष बचा है जो इसको मत,
और बिगाड़ो रे,
भजन कर अंत सँवारो रे,
हो अंत सँवारो रे।
 
हेर फेर से बहुत कमाया,
पाप पुण्य न समझा रे,
परमार्थ का भाव भूल के,
रहा स्वार्थ में उलझा रे।

जब भी आए अकल तभी से,
अपनी भूल सुधारे रे,
भजन कर अंत सँवारो रे,
हो अंत सँवारो रे।

करके सुमिरन अपने हरि का,
जीवन संवारों रे,
भजन कर अंत संवारो रे,
करके सुमिरन अपने हरि का,
जीवन संवारों रे,
भजन कर अंत संवारो रे।
 


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