संत द्वारे आया री सतरुदेव भजन

संत द्वारे आया री सतरुदेव भजन

संत हमारी आत्मा,
हम संतों की देह,
संतों में हम यूं रमें,
ज्यो बादल में मेह।

संत हमारी आत्मा,
हम संतों की श्वाँस,
संतों में हम यूं रमें,
ज्यों फूलन में बास।

संत दुआरे आया री,
जोड़्या दोनों हाथ,
जोड़्या दोनों हाथ सखी री,
करुँ ज्ञान की बात।

सतगुरु आया शब्द सुनाया,
निज मन हो गया हाथ,
सत शब्द की सेण बताई,
माला जपू दिन रात।

जाके सतगुरु सदा साथ,
वाको नही कोई घात,
निज भक्ति को बीज रोप्यो,
राल्यो संत को खाद।

पांचों चोर पकड़ बस कीन्हा,
सतगुरु मारी लात,
कुकर्मों की जात बणाई,
ईश्वर की नही जात।

साहब कबीर म्हारे समरथ,
मिल गया नौत जिमाया भात,
धरमदास पर कृपा कीन्हीं,
मिल गया दीनानाथ।

संत द्वारे आया री | Sant Dware Aaya Ri | Geeta Parag | Folk Song

Lyrics by Kabir/ गीत के शब्द - कबीर 
Composition - Traditional folkMain Vocal : Geeta Parag 
Choras & Majira : Leela Parag
 Harmonium : Tanu Parag
Timki/Nagari : Singaram Parag 
Dholak : Ram Sanveriya
Violin. : Paras Naik
Recording : Bhavit Recording Studio, Indore
Video : Premanchal Studio, Indore
Profile Art : Kabini Amin 

संतों में रहना जैसे बादल में पानी रहता है, या फूलों में खुशबू बसी रहती है। वे हमारी आत्मा बन जाते हैं, हमारी साँस बन जाते हैं। जब सतगुरु द्वार पर आते हैं तो दोनों हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो जाते हैं। वे ज्ञान की बात सुनाते हैं, शब्द सुनाते हैं, और मन एकदम उनके वश में हो जाता है।
सतगुरु के आने से सच्चे शब्द की राह दिख जाती है। फिर दिन-रात माला जपने की आदत लग जाती है। जिसके साथ सतगुरु सदा रहते हैं, उसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। भक्ति का बीज बो दिया जाता है, और संतों की संगति उसकी खाद बन जाती है।
पाँचों चोरों को पकड़कर बस में कर लिया जाता है, सतगुरु एक लात मारकर सबको दूर कर देते हैं। कुकर्मों की जड़ें उखड़ जाती हैं। ईश्वर की जात कोई नहीं, बस सच्ची भक्ति ही काम आती है।
कबीर साहब जैसे समर्थ गुरु जब मिल जाते हैं तो जीवन का सारा भात पक जाता है। धरमदास पर जैसी कृपा हुई, वैसे ही हर सच्चे भक्त पर दीनानाथ की कृपा बरसती है।
संतों की संगति में रहने से मन शांत और मजबूत हो जाता है। छोटी-छोटी बातों में भी ईश्वर का साथ महसूस होने लगता है। जीवन सरल और सुखी हो जाता है। 

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