हर शह में साईं ही साईं भजन

हर शह में साईं ही साईं भजन

हर शह में साईं ही साईं,
हर चेहरा चेहरा तेरा,
जिसको भी देखूं, लगता है मुझको अपना, मेरा।
हर शह में साईं ही साईं।।

किसको समझूं मैं अपना, किसको बेगाना मानूं मैं,
हर दिल में जब तू ही समाया, क्या समझूं, क्या जानूं मैं।
वैर किसी से करना चाहूं, तो भी कर न पाऊं मैं,
सब तेरी माया है साईं, मन ही मन दोहराऊं मैं।
तू ही कारण, तू ही करता,
हर झूठा, सच्चा तेरा,
जिसको भी देखूं, लगता है मुझको अपना, मेरा।
हर शह में साईं ही साईं।।

हर दम जब तू साथ है तो, क्या महफिल, क्या वीराना,
सुख में इतराना कैसा, फिर दुःख में कैसा घबराना।
कर्मों के बंधन में बंधा मैं, हर दम तुझको याद करूं,
तेरे ही सिमरन में डूबा, पल पल ये फरियाद करूं।
नित मस्तक होकर मैं कबूलूं, जो भी हो बख्शा तेरा,
जिसको भी देखूं, लगता है मुझको अपना, मेरा।
हर शह में साईं ही साईं।।

मैं अधना सा इक बंदा, क्या रुतबा, क्या हस्ती मेरी,
मैं क्या समझूं भेद तेरे, क्या समझूं बातें तेरी।
पाप-पुण्य में अंतर क्या है, दुनिया क्या है, जन्नत क्या,
तुझको ही अपना समझा बस, और न कुछ भी समझ सका।
मैं साहिल नादान बहुत हूं, पढ़ न सका लिखा तेरा,
जिसको भी देखूं, लगता है मुझको अपना, मेरा।
हर शह में साईं ही साईं।।


साईं दर्शन Sai Darshan I I PRAVEEN MOUDGIL I Sai Bhajan I Full Audio Song

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About Bhajan -

Sai Bhajan: Sai Satguru 
Singer: Praveen Moudgil 
Music Director: Amar Haldipur 
Lyricist: Pradeep Sahil 
Album: Sai Satguru
 
साईं की सर्वव्यापकता और उनके प्रेम का भाव भक्त के हृदय को एक ऐसी अनुभूति से भर देता है, जो उसे हर चेहर में, हर शय में केवल प्रभु की ही छवि दिखाता है। यह भाव उस गहरे विश्वास को दर्शाता है कि साईं हर दिल में बसे हैं, और उनकी माया ही सृष्टि का आधार है। भक्त का मन यह समझता है कि जब साईं हर जगह व्याप्त हैं, तो फिर अपनों और परायों का भेद करना व्यर्थ है। उनकी कृपा से भक्त का हृदय वैर और भेदभाव से मुक्त हो जाता है, और वह हर प्राणी में साईं का ही रूप देखता है। यह भक्ति भक्त को सिखाती है कि साईं ही सारे सुख-दुख के कारण और कर्ता हैं, और उनकी स्मृति में डूबकर ही जीवन का सच्चा आनंद प्राप्त होता है।

साईं का साथ भक्त को हर परिस्थिति में स्थिर और शांत रखता है, चाहे वह सुख की महफिल हो या दुख का वीराना। यह भाव उस अटल विश्वास को व्यक्त करता है कि साईं की स्मृति और उनके सिमरन में डूबा भक्त कर्मों के बंधन से मुक्त होकर हर पल उनकी फरियाद करता है। साईं की कृपा से भक्त का नादान मन भी उनके प्रेम में डूब जाता है, और वह पाप-पुण्य, दुनिया-जन्नत के भेद को भूलकर केवल साईं को ही अपना सब कुछ मानता है। यह भक्ति और समर्पण भक्त को साईं के चरणों में ले जाता है, जहाँ वह उनकी माया और उनके बख्शे हुए हर रूप को स्वीकार करता है, यह जानते हुए कि साईं का प्रेम ही उसके जीवन का असली साहिल और सत्य है।

Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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