आजा कुंज वाली गलियां ओ सांवरे

आजा कुंज वाली गलियां ओ सांवरे

आजा, कुंज वाली, गलियां... (ओ सांवरे) ॥
ओ तेरीयां, सखियां ने, इकल्लियां... (ओ सांवरे) ॥
तेरी, वाट, निहारां मैं... (ओ सांवरे) ॥
दिन, रात, गुजाऱां मैं... (ओ सांवरे) ॥

तूं तां मेरे, दिल दा जानी, मैं तां तेरी होई ।
रात-रात मैनूं, नींद ना पैंदी, मैं दीवानी होई ॥
ओ जागूं, सारी सारी, रत्तियां... (ओ सांवरे) ॥
आजा, कुंज वाली, गलियां... ॥१॥

यमुना तट मैं, आई सांवरे, याद च तेरे खोई ।
चुक के मेरा, घड़ा बेगाना, मैं दीवानी होई ॥
ओ मेरी, खाली है, मटकीया... (ओ सांवरे) ॥
आजा, कुंज वाली, गलियां... ॥२॥

निधिवन सोहणा, मधुवन सोहणा, मैं दीवानी होई ।
तेरी याद च, मेरे सांवरे, सारी सखियां रोई ॥
ओ मेरियां, तरसन, अखियां... (ओ सांवरे) ॥
आजा, कुंज वाली, गलियां... ॥३॥



आजा कुंज वाली गलियां ओ सांवरे तेरियां सखियां ने कल्लियां ओ सांवरे राधे राधे

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सावन की रिमझिम और कुंज गलियों की सैर में एक ऐसी तड़प छिपी है, जो हृदय को प्रियतम की याद में बेचैन कर देती है। यह वह प्यास है जो यमुना के तट पर, निधिवन और मधुवन की हरियाली में, हर सखी के मन में बसती है। वह प्रेम, जो रातों की नींद चुरा लेता है, और आँखों को प्रिय के दर्शन की आस में तरसाता है, एक ऐसी दीवानगी है जो आत्मा को परमात्मा के रंग में रंग देती है। यह बेचैनी केवल प्रेम की गहराई का प्रतीक नहीं, बल्कि उस अनन्य भक्ति का स्वर है जो हर पल प्रियतम की प्रतीक्षा में बीतता है। कुंज गलियों की पुकार, सखियों की किलकारियां, और यमुना के तट पर खाली मटकी का इंतज़ार, यह सब उस प्रेम की कहानी बयान करता है जो सांसारिक बंधनों से परे, केवल प्रिय के चरणों में समर्पण चाहता है।
 
Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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