हम लड़ने रयां बैणी कविता

हम लड़ने रयां बैणी कविता

बैणी फाँसी नी खाली ईजा,
और रो नि पड़ल भाई।
मेरी बाली उमर नि माजेली,
दीली ऊना कढ़ाई।।
मेरी बाली उमर नि माजेली,
तलि ऊना कड़ाई।।

रामरै फले लेफ्ट–रेट,
कसि हुछो बतूलो।
हम लड़ते रया बैणी,
हम लड़ते रूलो।।
हम लड़ते रया भुला,
हम लड़ते रूलो।।

अर्जुन ते कृष्ण कुछो,
रणभूमि छो सारी दूनी तो।
रण बे का बचुलो,
हम लड़ते रया बैणी,
हम लड़ते रूलो।।
हम लड़ते रया भुला,
हम लड़ते रूलो।।

धन माएड़ि छाती,
उनेरी धन तेरा ऊ लाल।
बलिदान की जोत जगे,
खोल गे उज्याल।।
खटीमा, मसूरी, मुज़फ्फरें कें,
हम कै भूलि जूलो।
हम लड़ते रया बैणी,
हम लड़ते रूलो।।
हम लड़ते रया चेली,
हम लड़ते रूलो।।

कस होलो उत्तराखंड,
कस हमारा नेता।
कसि होली विकास नीति,
कसि होली व्यवस्था।।
जड़ी कंजड़ी उखेली भली के,
पूरी बहस करूलो।
हम लड़ते रया बैणी,
हम लड़ते रूलो।।

साँच नि मराल झुरी–झुरी पा,
झूठी नि डोरी पाला।
लिस, लकड़ा, बजरी चोर,
जा नि फौरी पाला।।
जाधिन ताले योस नि है जो,
हम लड़ते रूलो।।
हम लड़ते रया बैणी,
हम लड़ते रूलो।।

मैसन हूँ, घर कुढ़ी हूँ,
भैसन हूँ खाल।
गोर बछन हूँ चरुहूँ,
चाड़ पौथन हूँ डाल।।
धुर जंगल फूल–फूलौं,
यस मुलुक बनुलो।।
हम लड़ते रया बैणी,
हम लड़ते रूलो।।
हम लड़ते रया दीदी,
हम लड़ते रूलो।।


गिर्दा की कविता गिरदा की जुबानी ' इस ब्योपारी को प्यास बहुत है...

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Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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