दिखा दे यार अब मुखड़ा घूंघट भजन

दिखा दे यार अब मुखड़ा घूंघट भजन

दिखा दे यार अब मुखड़ा,
घूंघट में क्यों छिपाया है।
हुस्न तेरे का है सानी,
ना दूजा मन में समाया है॥

नज़ारा प्रेम का भरके,
लगाया है जिगर मेरे।
जुदाई का अभी परदा,
बीच में क्यों गिराया है।
दिखा दे यार अब मुखड़ा,
घूंघट में क्यों छिपाया है॥

तेरे मिलने की खातिर को,
हज़ारों लोक तरसावें।
खुले किस्मत बड़ी जिसकी,
वही दीदार पाया है।
दिखा दे यार अब मुखड़ा,
घूंघट में क्यों छिपाया है॥

नहीं है आस इस तन की,
ना धन की लालसा मुझको।
वो ‘ब्रह्मानंद’ दे दर्शन,
यही दिल में समाया है।
दिखा दे यार अब मुखड़ा,
घूंघट में क्यों छिपाया है॥

दिखा दे यार अब मुखड़ा,
घूंघट में क्यों छिपाया है।
हुस्न तेरे का है सानी,
ना दूजा मन में समाया है॥


गजल राग ।। दिखादे यार अब मुखड़ा ।। Singer Ramesh dadhich

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तेरे मुखड़े की एक झलक की आस में समर्पित हर धड़कन जैसे चन्दनों की नर्म खुशबू बनकर फैलती है; घूंघट की ओट में छुपा सौंदर्य केवल भौतिक नहीं, वह आत्मा की एक शर्मीली किमिया है जो दिखते ही भीतर की प्यास बुझा दे। तेरे नयन-नखरे में बसी वह मौन पुकार दिल की राख में फिर से चमक जगा देती है; जब तक वह आवरण हटता नहीं, हर पल इंतज़ार खुद में एक तरह का अनुग्रह बनकर रह जाता है। मिलने की तीव्र तमन्ना उन क्षणों को और भी पवित्र बना देती है, जैसे कोई दीर्घप्रतीक्षित वृष्टि सूखी ज़मीन पर उतरे—वो दीदार पाने वालों की किस्मत को बदल देता है। तन-धन की कामना उसके सामने क्षीण लगती है; केवल उस दृश्य की चाह ही सब आरज़ुओं का सार बनकर रह जाती है। घूंघट हटते ही जो उजास निकलेगा, वह न केवल आँखों का स्वाद बढ़ाएगा, बल्कि पूरे अस्तित्व को एक नई पहचान दे देगा।
 
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Singer Ramesh dadhich ph 9950075138 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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