जिनके हिरदये सिया राम वसे श्रीराम भजन
जिनके हिरदये सिया राम वसे श्रीराम भजन
जिनके हृदय सिया-राम बसे,
तिन और का नाम लिया न लिया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
जिनके घर एक सपूत भयो,
तिन लाख कपूत हुआ न हुआ रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
जिन मात-पिता की सेवा की,
तिन तीर्थ-व्रत किया न किया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
जिनके द्वारे पर गंग बहे,
तिन कूप का नीर पिया न पिया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
तुलसीदास विचार करे,
कपटी को मीत किया न किया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
तिन और का नाम लिया न लिया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
जिनके घर एक सपूत भयो,
तिन लाख कपूत हुआ न हुआ रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
जिन मात-पिता की सेवा की,
तिन तीर्थ-व्रत किया न किया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
जिनके द्वारे पर गंग बहे,
तिन कूप का नीर पिया न पिया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
तुलसीदास विचार करे,
कपटी को मीत किया न किया रे,
जिनके हृदय सिया-राम बसे।।
Jinke Hriday Siyaram Base - Yatendra Kumar Vij | Ram Bhajan | Sanskar Bhajan
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Song : Jinke Hriday Siyaram Base
Singer : Yatendra Kumar Vij
Label : Sanskar Bhajan
Singer : Yatendra Kumar Vij
Label : Sanskar Bhajan
जिस हृदय में सिया-राम का प्रेम बस जाता है, उसके जीवन की दिशा ही बदल जाती है। उसके लिए संसार के आकर्षण धीरे-धीरे महत्वहीन हो जाते हैं, क्योंकि उसे सबसे बड़ा धन प्रभु का स्मरण और उनकी कृपा प्राप्त हो जाती है। ऐसा मन प्रेम, करुणा, सत्य और विनम्रता से भर जाता है। जीवन की सफलता केवल बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उस आंतरिक शांति में है, जो प्रभु के चरणों में समर्पण करने से प्राप्त होती है। जब हृदय में श्रीराम का वास होता है, तब प्रत्येक कर्म धर्म का रूप ले लेता है और प्रत्येक दिन ईश्वर की कृपा का अनुभव कराने लगता है।
माता-पिता की सेवा, सदाचार, सच्ची संगति और निष्कपट आचरण ऐसे गुण हैं जो भक्ति को और अधिक उज्ज्वल बनाते हैं। पवित्रता केवल तीर्थों की यात्रा से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और विचारों की निर्मलता से भी प्राप्त होती है। कपट, अहंकार और स्वार्थ मनुष्य को प्रभु से दूर ले जाते हैं, जबकि प्रेम, विश्वास और सेवा का भाव उन्हें हृदय के निकट ले आता है। सिया-राम का स्मरण मनुष्य को यही शिक्षा देता है कि जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य प्रभु को अपने हृदय में स्थान देना और उनके आदर्शों के अनुसार जीवन जीना है। जय सिया राम!
माता-पिता की सेवा, सदाचार, सच्ची संगति और निष्कपट आचरण ऐसे गुण हैं जो भक्ति को और अधिक उज्ज्वल बनाते हैं। पवित्रता केवल तीर्थों की यात्रा से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और विचारों की निर्मलता से भी प्राप्त होती है। कपट, अहंकार और स्वार्थ मनुष्य को प्रभु से दूर ले जाते हैं, जबकि प्रेम, विश्वास और सेवा का भाव उन्हें हृदय के निकट ले आता है। सिया-राम का स्मरण मनुष्य को यही शिक्षा देता है कि जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य प्रभु को अपने हृदय में स्थान देना और उनके आदर्शों के अनुसार जीवन जीना है। जय सिया राम!
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Author - Saroj Jangir
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