म्हारा जूना जोशी राम मिलन कब होसी भजन
म्हारा जूना जोशी राम मिलन कब होसी भजन
म्हारा जूना जोशी,
राम मिलन कब होसी,
राम मिलन कब होसी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
आओ जोशी जी, ये पाट बिराजो,
बाँच सुनाइयो थी पोथी जी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
खीर-खाँड का, जोशी, भोजन जिमामा,
नित जिमावाँ थारा गोती,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
आठ भरी को, जोशी, बागो सिलवासा,
हीरा जड़वाया थारी पोथी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
बाई तो मीरा के गिरधर नागर,
राम मिलाया, सुखी होसी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
राम मिलन कब होसी,
राम मिलन कब होसी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
आओ जोशी जी, ये पाट बिराजो,
बाँच सुनाइयो थी पोथी जी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
खीर-खाँड का, जोशी, भोजन जिमामा,
नित जिमावाँ थारा गोती,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
आठ भरी को, जोशी, बागो सिलवासा,
हीरा जड़वाया थारी पोथी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
बाई तो मीरा के गिरधर नागर,
राम मिलाया, सुखी होसी,
म्हारा जूना जोशी, राम मिलन कब होसी।।
ओ म्हारा जुना जोशी राम मिलण कद होसी.. by dilipdas & gulabnath ji maharaj new bhajan
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प्रभु श्रीराम से मिलने की तड़प ही सच्ची भक्ति का सबसे सुंदर स्वरूप है। जब मन संसार के सुखों से तृप्त नहीं होता, तब उसके भीतर अपने आराध्य के दर्शन और कृपा की गहरी प्यास जाग उठती है। यही प्यास जीवन को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाती है और हर क्षण प्रभु के स्मरण में डुबो देती है। भविष्य जानने की उत्सुकता भी अंततः इसी एक प्रश्न पर आकर ठहर जाती है कि वह शुभ घड़ी कब आएगी, जब प्रभु अपने भक्त पर कृपा-दृष्टि करेंगे और हृदय उनकी उपस्थिति का अनुभव करेगा। उस मिलन की प्रतीक्षा में प्रत्येक दिन आशा, विश्वास और प्रेम से भर जाता है।
भौतिक उपहार, आदर-सत्कार और वैभव का वास्तविक महत्व तभी है, जब उनके पीछे श्रद्धा और निष्कपट भाव हो। मीरा की भाँति जिसने अपने जीवन का सर्वस्व प्रभु को समर्पित कर दिया, उसे अंततः वही परम आनंद प्राप्त हुआ जिसकी खोज हर भक्त करता है। श्रीराम से मिलन केवल बाहरी दर्शन नहीं, बल्कि हृदय में उनके प्रेम, करुणा और मर्यादा का जागरण है। जब मन पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु को अपना लेता है, तब जीवन की हर प्रतीक्षा सफल हो जाती है और आत्मा को वह शांति मिलती है, जिसकी तुलना संसार का कोई सुख नहीं कर सकता। जय श्रीराम!
भौतिक उपहार, आदर-सत्कार और वैभव का वास्तविक महत्व तभी है, जब उनके पीछे श्रद्धा और निष्कपट भाव हो। मीरा की भाँति जिसने अपने जीवन का सर्वस्व प्रभु को समर्पित कर दिया, उसे अंततः वही परम आनंद प्राप्त हुआ जिसकी खोज हर भक्त करता है। श्रीराम से मिलन केवल बाहरी दर्शन नहीं, बल्कि हृदय में उनके प्रेम, करुणा और मर्यादा का जागरण है। जब मन पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु को अपना लेता है, तब जीवन की हर प्रतीक्षा सफल हो जाती है और आत्मा को वह शांति मिलती है, जिसकी तुलना संसार का कोई सुख नहीं कर सकता। जय श्रीराम!
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Author - Saroj Jangir
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