मोती समंदरा मोती रे चल उड़ हंसवा देश भजन
मोती समंदरा मोती रे चल उड़ हंसवा देश भजन
अरे मुट्ठी लाया ज्ञान कि, तो वा में वस्तु अनेक।
1. डुबकी मारी समुद्र मे औ,र जा निकसाया आकाश।
गगन मंडल में घर किया, जहा हीरा पाया दास।
भजन —मोती समंदरा मोती रे चल उड़ हंसवा देश।
1.चल हंसवा देस निराला ,बीना सत भाण होत उजियारा
उना देस में, जले जगा मग जोती रे चल उड़ हंसवा देश...।
2 . काला पीला रंग बिरंगा, माला में मणिया बहु रंगा।
ऊनी माला के पेरे सुहागन सुरती रे, चल उड़ हंसवा देश..l
3. उना देस में वेद नही हैं, ऊंच नीच का भेद नहीं हैं।
उना देस में, सागो मिले ना कोई गोती रे, चल उड़ हंसवा देश.।
4. जाई करो समंद मे वासा, फेर नही आवन की आशा।
हंस अकेला जाई हंसनी रोती रे चल उड़ हंसवा देश...।
5. जुगा जुगा से सोयो म्हारो हंसो, सतगुरू आय जगायो है जीव को।
कहे कबीर धरम दास अमर घर वासा रे, चल उड़ हंसवा देश..।
मोती समंदरा | Moti samandra | Geeta Parag | Kabir bhajan ,9669359081
Main Vocal : Geeta Parag
Chours & Majira : Lila Parag
Timki/Nagari : Singaram Parag
Dholak. : Ajay Tipaniya
Harmonium : Tanu Parag
Violin. : Devnarayan Saroliya
Venue : Lunyakhedi,Kabir aashram
Venue support : Padmshree Prahlad singh Tipaniya
समुद्र में एक डुबकी लगाई तो ज्ञान का मुट्ठी भर आया, उसमें अनगिनत रत्न छुपे मिले। आकाश में घर बनाया, गगन मंडल में हीरा पाया जहां डास ने। मोती के समंदर में हंसवा उड़ चला निराले देश को, बिना सत भाण के उजियारा कैसे हो। इश्वर का आशर्वाद है जो जगा देता सोए हंसो को, जुगा-जुगा की नींद तोड़ देता। वहां काले पीले रंग बिरंगे मणि की माला पहने सुहागन सुंदर विराजमान।
वेद न हों, ऊंच-नीच का भेद न हो, सागर मिले बिना गोती के। समुद्र में वास कर लिया तो लौटने की आस न रहे, हंस अकेला चला हंसिन रोती रही। सतगुरु ने जगाया जीव को, कबीर कहते धरम दास अमर घर में बस जाएं। ये सफर आत्मा को छू जाता, परछाईं जैसा नेह जगा देता। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री कबीर जी।
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