जियो और जीने दो का यह मंत्र निराला है
जियो और जीने दो का यह मंत्र निराला है
जियो और जीने दो का,
यह मंत्र निराला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
धधक रही है धरती,
हिंसा के अंगारों से,
रुदन करे वसुधा,
पशुओं की करुण पुकारों से,
भरे पड़े हैं राजमहल,
देखो हथियारों से,
हार रहे हैं संस्कार,
कुत्सित व्यभिचारों से,
हिंसा के अंधियारों में,
एक मात्र उजाला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
तुम जैसे ही हर प्राणी को,
जीवन प्यारा है,
तुम जैसे ही वह भी किसी की,
आंख का तारा है,
मूक धरा का मानवता को,
यही इशारा है,
गर प्राण न दो तो मारो न,
कर्तव्य तुम्हारा है,
करुणा, दया, प्रेम ने ही यह,
जगत संभाला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
जियो और जीने दो का,
यह मंत्र निराला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
यह मंत्र निराला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
धधक रही है धरती,
हिंसा के अंगारों से,
रुदन करे वसुधा,
पशुओं की करुण पुकारों से,
भरे पड़े हैं राजमहल,
देखो हथियारों से,
हार रहे हैं संस्कार,
कुत्सित व्यभिचारों से,
हिंसा के अंधियारों में,
एक मात्र उजाला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
तुम जैसे ही हर प्राणी को,
जीवन प्यारा है,
तुम जैसे ही वह भी किसी की,
आंख का तारा है,
मूक धरा का मानवता को,
यही इशारा है,
गर प्राण न दो तो मारो न,
कर्तव्य तुम्हारा है,
करुणा, दया, प्रेम ने ही यह,
जगत संभाला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
जियो और जीने दो का,
यह मंत्र निराला है,
प्राणी मात्र के जीवन में,
सुख भरने वाला है,
जियो और जीने दो।
जियो और जीने दो | महावीर जन्मकल्याणक भजन | Jiyo Aur Jeene Di | Mahavir Jayanti Jain Bhajan | Jainism
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मानवीय जीवन की मौजूदा स्थिति पर संवेदनशील नजर डालते हुए यह भाव उठता है कि हिंसा, क्रूरता और स्वार्थ की आग से धरती धधक रही है, पशु–पक्षियों की मूक करुण पुकारें वातावरण को भर रही हैं और राजमहलों में भी हथियारों, लालच और व्यभिचार का अंधेरा छाया है। ऐसे समय में “जियो और जीने दो” का संदेश एक दीपक की तरह है, जो याद दिलाता है कि हर प्राणी को जीवन उतना ही प्यारा है जितना हमें, वह भी किसी की आँखों का तारा है; इसलिए यदि प्राण नहीं दे सकते तो कम से कम उन्हें छीनने का अधिकार भी हमें नहीं लेना चाहिए।
प्रेम, करुणा और दया को ही वह आधार माना गया है जिसने इस जगत को अब तक संभालकर रखा है, और आगे भी वही सबको जोड़कर रख सकते हैं। मनुष्यता की असली पहचान यही है कि दूसरों के अधिकारों, जीवन और संवेदनाओं का आदर किया जाए, चाहे वे मनुष्य हों या मूक प्राणी। जो इस मंत्र को हृदय से स्वीकार कर लेता है, उसके भीतर हिंसा घटती है, अहंकार नरम पड़ता है और जीवन में शांति तथा संतोष का सुंदर प्रवाह शुरू हो जाता है; इस प्रकार “जियो और जीने दो” केवल नारा नहीं, पूरी जीवन–दृष्टि बन जाता है।
प्रेम, करुणा और दया को ही वह आधार माना गया है जिसने इस जगत को अब तक संभालकर रखा है, और आगे भी वही सबको जोड़कर रख सकते हैं। मनुष्यता की असली पहचान यही है कि दूसरों के अधिकारों, जीवन और संवेदनाओं का आदर किया जाए, चाहे वे मनुष्य हों या मूक प्राणी। जो इस मंत्र को हृदय से स्वीकार कर लेता है, उसके भीतर हिंसा घटती है, अहंकार नरम पड़ता है और जीवन में शांति तथा संतोष का सुंदर प्रवाह शुरू हो जाता है; इस प्रकार “जियो और जीने दो” केवल नारा नहीं, पूरी जीवन–दृष्टि बन जाता है।
Singer: Smt. Reetika Jain (Jabalpur)
Lyrics, Compositions & Recording: Dr. Rajeev Jain (Chandigarh)
Lyrics, Compositions & Recording: Dr. Rajeev Jain (Chandigarh)
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Author - Saroj Jangir
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