हरि कै गयो बंटाढार रे जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
हरि कै गयो बंटाढार रे। इकली कालि कूल-कालिंदी लखत रही जलधार रे। तहँ आयो घूमत अति झूमत, नटखट नंदकुमार रे। देखत ही देखत देखत ही, द्वै दृग है गये चार रे। कह्यो मोहिं प्यारी नथवारी!, मोते करि ले प्यार रे। इकटक लागि 'कृपालु' टकटकी, सुधि बुधि देह बिसार रे।।
एक सखी अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती है कि श्यामसुंदर ने अद्भुत कार्य किया। वह कल अकेली यमुना के किनारे जलधारा को निहार रही थी, तभी नटखट नंदकुमार झूमते हुए वहाँ आ पहुँचे। उनकी नजरें मिलते ही, श्रीकृष्ण ने सखी से कहा, "ओ नथ वाली प्यारी! मुझसे थोड़ा-सा प्रेम कर लो।" 'श्री कृपालु जी' के अनुसार, सखी इस अप्रत्याशित मिलन से अपनी सुध-बुध खो बैठी और एकटक श्रीकृष्ण को निहारती रही।
Krishna Bhajan Lyrics Hindi
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की रचनाएँ भक्ति रस से परिपूर्ण हैं और श्रीकृष्ण के प्रति गहन प्रेम को अभिव्यक्त करती हैं। उनकी कृतियाँ आज भी भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं और भक्ति संगीत के रूप में गाई जाती हैं।
हरि कै गयो बंटाढार रे | प्रेम रस मदिरा | मिलन-माधुरी | Ft. Akhileshwari Didi
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