रे मन रे मन जो मत गावो हरी के गुण

रे मन रे मन जो मत गावो हरी के गुण

रे मन रे मन जो मत गावो हरी के गुण ।
नयन मेरे तरस रहे, पाने को श्री हरी दर्शन ।
श्रवन मेरे तरस रहे, सुनने को श्री हरी कीर्तन ॥

हाथ मेरे तरस रहे करने को श्री हरी सेवन ।
जिव्हा मेरी तरस रही करने को हरी नाम स्मरण ॥

दिल मेरा मचल रहा, करने को हरी आलिंगन ।
जीव मेरा तरस रहा पाने को सचिदा आनंद घन ॥

मन की गहराई में एक तड़प है, हर पल हरि के गुण गाने की। आँखें बेचैन हैं, बस एक झलक श्री हरि की पाने को। जैसे कोई प्यासा सागर के किनारे खड़ा हो, वैसे ही कान तरस रहे हैं कीर्तन की मधुर धुन सुनने को।

हाथ थकते नहीं, बस हरि की सेवा में जुट जाना चाहते हैं। जीभ हर पल उनके नाम का जप करने को बेताब है, मानो कोई मधुर स्वाद बार-बार चखना चाहे। दिल में एक हूक उठती है, हरि को गले लगाने की, जैसे बच्चा माँ की गोद में समा जाना चाहता है। और आत्मा? वो तो सच्चिदानंद की उस अनंत शांति में डूबने को बेकरार है, जैसे नदी सागर में मिलकर पूर्ण हो जाती है।

Rae Mana bhajan by Sri Ganapathy Sachchidananda Swamiji

Sri Ganapathy Sachchidananda Swamiji sing bhajan about Lord Krishna. This session was held in San Jose, California, Saturday Aug. 1, 2009. This is Part 1 of 2.

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