कान्हा तेरे बिना मुझको कुछ भी न भाये
कान्हा तेरे बिना मुझको कुछ भी न भाये भजन
अब ना सताओ जल्दी से आओ,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
ओ कान्हा तेरे बिना मुझको कुछ भी न भाए,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
अखियां तरस गई तेरे दीदार को,
देर न लगाओ मोहन इस लाचार को,
कैसे बताऊ कैसे संभालूं,
कृष्ण तू ही सब में समाये,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
कहा या छुपा है कन्हैया सुन के तो आओ,
जान दे दूंगा आ सच में अब न सताओ ,
दिल में वसे हो कण कण में बसे हो,
तू ही आके समजाओ,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
ओ कान्हा तेरे बिना मुझको कुछ भी न भाए,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
अखियां तरस गई तेरे दीदार को,
देर न लगाओ मोहन इस लाचार को,
कैसे बताऊ कैसे संभालूं,
कृष्ण तू ही सब में समाये,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
कहा या छुपा है कन्हैया सुन के तो आओ,
जान दे दूंगा आ सच में अब न सताओ ,
दिल में वसे हो कण कण में बसे हो,
तू ही आके समजाओ,
अब न रुलाओ जल्दी से आओ,
यह भजन श्रीकृष्णजी के प्रति गहन प्रेम और उनके दर्शन की तीव्र अभिलाषा को प्रकट करता है। जब भक्त अपने आराध्य से दूर होता है, तब उसका मन किसी भी सांसारिक चीज़ में रम नहीं पाता—उसके लिए श्रीकृष्णजी का सान्निध्य ही जीवन का सर्वोच्च सुख बन जाता है।
भजन का यह भाव बताता है कि जब श्रीकृष्णजी की अनुपस्थिति में हृदय व्याकुल होता है, तब आँखें उनकी छवि को देखने के लिए तरसती हैं, मन उनकी कृपा का आह्वान करता है, और आत्मा उनकी निकटता को पाने के लिए पुकार उठती है। यह प्रेम एक साधारण अनुराग नहीं, बल्कि वह दिव्य आकर्षण है, जो आत्मा को परमात्मा की ओर ले जाता है।
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