संता की सेवा करज्यो ये घर कि सुन्दर नार
संता की सेवा करज्यो ये घर कि सुन्दर नार
संता की सेवा करजो ये,
घर की सुंदर नार।
सतगुरु आया है सखी,
काई मनवार करा,
चौंक पुरावो गज मोतिया,
मैं चंदन तिलक करा।
संता की सेवा करजो ये,
घर की सुंदर नार,
घर की सुंदर नार सुरता,
घर की सुंदर नार।।
संता पधारिया पावणा जी,
जाजम दिज्यो ढाल,
सात सखियां मिलकर,
थे गावो मंगलाचार।।
खीर, खांड अर मधु भोजन,
जल्दी करो तैयार,
भाव रूपी ढोलो बायरो,
कर-कर मन प्यार।।
माधु सिंह जी कोप करयो,
बाजेली तलवार,
जिवाला तो फेर मिलाला,
साहब के दरबार।।
संत उबारण, तारण कारण,
लेलिनो अवतार,
सेन भक्त का सांचा मेटिया,
नाय बणो करतार।।
संता की सेवा करजो ये,
घर की सुंदर नार,
घर की सुंदर नार सुरता,
घर की सुंदर नार।।
घर की सुंदर नार।
सतगुरु आया है सखी,
काई मनवार करा,
चौंक पुरावो गज मोतिया,
मैं चंदन तिलक करा।
संता की सेवा करजो ये,
घर की सुंदर नार,
घर की सुंदर नार सुरता,
घर की सुंदर नार।।
संता पधारिया पावणा जी,
जाजम दिज्यो ढाल,
सात सखियां मिलकर,
थे गावो मंगलाचार।।
खीर, खांड अर मधु भोजन,
जल्दी करो तैयार,
भाव रूपी ढोलो बायरो,
कर-कर मन प्यार।।
माधु सिंह जी कोप करयो,
बाजेली तलवार,
जिवाला तो फेर मिलाला,
साहब के दरबार।।
संत उबारण, तारण कारण,
लेलिनो अवतार,
सेन भक्त का सांचा मेटिया,
नाय बणो करतार।।
संता की सेवा करजो ये,
घर की सुंदर नार,
घर की सुंदर नार सुरता,
घर की सुंदर नार।।
संता कि तो सेवा करज्यो ये घर कि सुन्दर नार// गायक मनोहर परसोया किशनगढ// लाईव प्रोग्राम गांव दादिया.
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लिखित भजन
श्लोक = सतगुरू आया है सखी काई मनवार करा ,, चोक पुरावु गज मोतिया मे चंदन तिलक करा !!
स्थाई = संता कि सेवा करज्यो ये,, घर कि सुन्दर नार!!
घर कि सुन्दर नार सुरता, घर कि सुन्दर नार !!
(1) संता पधारिया पांवणा जी जाजम दिज्यो ढाल,, सात सखिया मिलकर थे गावो मंगला चार !!
(2) खिर खाढरा अमरत भोजन जल्दी करो तैयार,, भाव रूपी ढोलो बायरो कर कर मन प्यार !!
(3) माधु सिंह जी कोप करयो जद बाजेली तलवार,, जिवाला तो फेर मिलाला सायब के दरबार !!
(4) संत उबारण त्यारण कारण लेलिनो अवतार,, सेन भक्त का सासा मेटिया नाय बणो करतार !!
गायक मनोहर परसोया किशनगढ
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श्लोक = सतगुरू आया है सखी काई मनवार करा ,, चोक पुरावु गज मोतिया मे चंदन तिलक करा !!
स्थाई = संता कि सेवा करज्यो ये,, घर कि सुन्दर नार!!
घर कि सुन्दर नार सुरता, घर कि सुन्दर नार !!
(1) संता पधारिया पांवणा जी जाजम दिज्यो ढाल,, सात सखिया मिलकर थे गावो मंगला चार !!
(2) खिर खाढरा अमरत भोजन जल्दी करो तैयार,, भाव रूपी ढोलो बायरो कर कर मन प्यार !!
(3) माधु सिंह जी कोप करयो जद बाजेली तलवार,, जिवाला तो फेर मिलाला सायब के दरबार !!
(4) संत उबारण त्यारण कारण लेलिनो अवतार,, सेन भक्त का सासा मेटिया नाय बणो करतार !!
गायक मनोहर परसोया किशनगढ
सुन्दर भजन में संत सेवा का दिव्य महत्व प्रदर्शित किया गया है। संत केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि उनके चरणों में बैठकर जीवन के गूढ़ अर्थ को आत्मसात किया जाता है। जब श्रद्धा और प्रेम से उनकी सेवा की जाती है, तब आत्मा शुद्ध होती है और मन के भीतर आध्यात्मिक शीतलता का संचार होता है।
संतों के आगमन का स्वागत केवल बाहरी आयोजन नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची श्रद्धा का प्रमाण होता है। उनके आगमन से वातावरण पावन होता है, ज्ञान की अनुभूति गहरी होती है, और भक्त के मन में स्नेह, सेवा और भक्ति का भाव प्रवाहित होता है। गृह के भीतर उनकी उपस्थिति, सत्य और दिव्यता की स्थापना का प्रतीक है।
इस भजन में सेवा का भाव केवल एक कर्म नहीं, बल्कि आत्मा के निर्मलता की ओर बढ़ने का मार्ग है। संत की कृपा से भक्त का जीवन धन्य होता है, और वह ज्ञान के सागर में प्रविष्ट होकर आत्मिक संतोष प्राप्त करता है। उनकी उपस्थिति, आत्मा को शुद्ध करने और ज्ञान के प्रकाश को विस्तारित करने का माध्यम बनती है।
संतों की सेवा से जीवन में धर्म और प्रेम का समरस संतुलन आता है। जब व्यक्ति स्वयं को अहंकार से मुक्त कर, श्रद्धा से सेवा करता है, तब उसकी आत्मा आनंद का अनुभव करती है। संत की कृपा से जीवन के सारे अवरोध समाप्त हो जाते हैं और भक्ति का पथ उज्ज्वल हो जाता है। यही सेवा का सच्चा स्वरूप है, जो आत्मा को परम आनंद और सत्य के प्रकाश से जोड़ता है।
संतों के आगमन का स्वागत केवल बाहरी आयोजन नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची श्रद्धा का प्रमाण होता है। उनके आगमन से वातावरण पावन होता है, ज्ञान की अनुभूति गहरी होती है, और भक्त के मन में स्नेह, सेवा और भक्ति का भाव प्रवाहित होता है। गृह के भीतर उनकी उपस्थिति, सत्य और दिव्यता की स्थापना का प्रतीक है।
इस भजन में सेवा का भाव केवल एक कर्म नहीं, बल्कि आत्मा के निर्मलता की ओर बढ़ने का मार्ग है। संत की कृपा से भक्त का जीवन धन्य होता है, और वह ज्ञान के सागर में प्रविष्ट होकर आत्मिक संतोष प्राप्त करता है। उनकी उपस्थिति, आत्मा को शुद्ध करने और ज्ञान के प्रकाश को विस्तारित करने का माध्यम बनती है।
संतों की सेवा से जीवन में धर्म और प्रेम का समरस संतुलन आता है। जब व्यक्ति स्वयं को अहंकार से मुक्त कर, श्रद्धा से सेवा करता है, तब उसकी आत्मा आनंद का अनुभव करती है। संत की कृपा से जीवन के सारे अवरोध समाप्त हो जाते हैं और भक्ति का पथ उज्ज्वल हो जाता है। यही सेवा का सच्चा स्वरूप है, जो आत्मा को परम आनंद और सत्य के प्रकाश से जोड़ता है।
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Author - Saroj Jangir
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