हे करुणा के सागर हे ममतामई माँ
हे करुणा के सागर हे ममतामई माँ
हे करुणा के सागर, हे ममता-मई माँ,
मैं तेरा हूँ माता, मुझे तू सँभालो।
मैं चरणों में तेरे आन पड़ा हूँ,
जगत के भँवर से मुझे तू निकालो।।
हे करुणा के सागर, हे ममता-मई माँ।।
अंतरा 1 :
तेरा नाम है दाती, दीन दयाला,
है लाखों को तूने भँवर से निकाला।
हूँ मैं भी मईया, उन्हीं से बिछुड़ा,
हूँ फूल जैसे कोई डाली से उखड़ा।।
जगत की तपिश से मैं मुरझा न जाऊँ,
मुझे भी माँ अब तो गोदी बिठा लो।।
अंतरा 2 :
तुझे न पुकारूँ तो किसको पुकारूँ,
मैं सपनों में मईया तेरी छवि निहारूँ।
पतितों की रक्षक, मेरी मात अम्बे,
तूँ भक्त वत्सल, तूँ ही जगदम्बे।।
दया मई दाती, दया अब तू कर दे,
कि दास किंचिन को अब माँ बचा लो।।
अंतरा 3 :
जगत के झमेलों ने मुझको रुलाया,
जो सच्ची प्रीति थी उसी को भुलाया।
ना दर-दर भटकना मुझे अब भवानी,
हैं दिल की जो बातें, तुझी को सुनानी।।
मुझे अपनी यादों के अश्रु माँ दे दो,
माँ अपने ही आँचल में मुझको छुपा लो।।
अंतरा 4 :
तेरे नाम की ज्योति हृदय में जलाऊँ,
तेरे चरणों में ही ध्यान मैं लगाऊँ।
भक्ति तेरी करके माँ पल-पल सँवरूँ,
तेरी छवि में डूब के जीवन निखरूँ।।
मुझे अपना करके माँ अपना ही कर लो,
कि अपने में मईया मुझे तू समा लो।।
अंतरा 5 :
माँ दया की तेरी तो सीमा न होती,
जो बालक मलिन हो तो माँ ही है धोती।
मेरे मन को ऐसा माँ निर्मल बना दो,
मुझे तूँ अपने ही हाथों सजा दो।।
माँ अपने ही काबिल मुझे अब बना दे,
भक्ति के पथ पर माँ मुझको चला दे।।
अंतरा 6 :
मैं पापी हूँ मईया, तू पाप-भंजन,
कर दे कृपा माँ, कर दे निरंजन।
तू भोली, तेरे भोले-भाले भंडारी,
वो नंदी पे बैठे, तू सिंह पे सवारी।।
भूलों-भटकों की मईया, दयालु दुलारी,
मेरे पाप भी माँ अब दिल से भुला दे।।
अंतरा 7 :
माँ तेरी इच्छा से संसार सारा,
करुणा की ज्योति ने मुझको पुकारा।
जहाँ रखना अपनी लगन में ही रखना,
मुझे तेरी भक्ति का रस है चखना।।
मैं मईया तेरा हूँ, तेरा ही रहूँगा,
मेरे चित्त को माँ अपने में लगा लो।।
मैं तेरा हूँ माता, मुझे तू सँभालो।
मैं चरणों में तेरे आन पड़ा हूँ,
जगत के भँवर से मुझे तू निकालो।।
हे करुणा के सागर, हे ममता-मई माँ।।
अंतरा 1 :
तेरा नाम है दाती, दीन दयाला,
है लाखों को तूने भँवर से निकाला।
हूँ मैं भी मईया, उन्हीं से बिछुड़ा,
हूँ फूल जैसे कोई डाली से उखड़ा।।
जगत की तपिश से मैं मुरझा न जाऊँ,
मुझे भी माँ अब तो गोदी बिठा लो।।
अंतरा 2 :
तुझे न पुकारूँ तो किसको पुकारूँ,
मैं सपनों में मईया तेरी छवि निहारूँ।
पतितों की रक्षक, मेरी मात अम्बे,
तूँ भक्त वत्सल, तूँ ही जगदम्बे।।
दया मई दाती, दया अब तू कर दे,
कि दास किंचिन को अब माँ बचा लो।।
अंतरा 3 :
जगत के झमेलों ने मुझको रुलाया,
जो सच्ची प्रीति थी उसी को भुलाया।
ना दर-दर भटकना मुझे अब भवानी,
हैं दिल की जो बातें, तुझी को सुनानी।।
मुझे अपनी यादों के अश्रु माँ दे दो,
माँ अपने ही आँचल में मुझको छुपा लो।।
अंतरा 4 :
तेरे नाम की ज्योति हृदय में जलाऊँ,
तेरे चरणों में ही ध्यान मैं लगाऊँ।
भक्ति तेरी करके माँ पल-पल सँवरूँ,
तेरी छवि में डूब के जीवन निखरूँ।।
मुझे अपना करके माँ अपना ही कर लो,
कि अपने में मईया मुझे तू समा लो।।
अंतरा 5 :
माँ दया की तेरी तो सीमा न होती,
जो बालक मलिन हो तो माँ ही है धोती।
मेरे मन को ऐसा माँ निर्मल बना दो,
मुझे तूँ अपने ही हाथों सजा दो।।
माँ अपने ही काबिल मुझे अब बना दे,
भक्ति के पथ पर माँ मुझको चला दे।।
अंतरा 6 :
मैं पापी हूँ मईया, तू पाप-भंजन,
कर दे कृपा माँ, कर दे निरंजन।
तू भोली, तेरे भोले-भाले भंडारी,
वो नंदी पे बैठे, तू सिंह पे सवारी।।
भूलों-भटकों की मईया, दयालु दुलारी,
मेरे पाप भी माँ अब दिल से भुला दे।।
अंतरा 7 :
माँ तेरी इच्छा से संसार सारा,
करुणा की ज्योति ने मुझको पुकारा।
जहाँ रखना अपनी लगन में ही रखना,
मुझे तेरी भक्ति का रस है चखना।।
मैं मईया तेरा हूँ, तेरा ही रहूँगा,
मेरे चित्त को माँ अपने में लगा लो।।
हे करूणा की सागर हे ममतामयी माँ Maninder JI BHAJAN VAISHNO DEVI
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Admin - Saroj Jangir
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