हमरे चीर दे बनवारी लिरिक्स

हमरे चीर दे बनवारी लिरिक्स

हमरे चीर दे बनवारी॥टेक॥
लेकर चीर कदंब पर बैठे। हम जलमां नंगी उघारी॥१॥
तुमारो चीर तो तब नही। देउंगा हो जा जलजे न्यारी॥२॥
ऐसी प्रभुजी क्यौं करनी। तुम पुरुख हम नारी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। तुम जीते हम हारी॥४॥
भावार्थ:
मीराँबाई अपने प्रिय कृष्ण के बिना अपने घर और आँगन को सुहावना नहीं मानतीं।
वे दीपों से सजाए गए घर में अपने प्रियतम की याद में गाती और नाचती हैं।
उनकी सोनी बिस्तर पर अकेले सोने से मन उदास है, और वे रातें जागकर बिताती हैं।
नींद उनकी आँखों से दूर है, और वे अपने प्रियतम की याद में व्याकुल हैं।
वे अपने मन की व्यथा को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वे अकेले हैं, और कोई उनका साथ नहीं देता।
वे अपने प्रियतम की याद में हृदय में व्याकुलता महसूस करती हैं।
वे अपने प्रियतम से मिलने का अवसर चाहती हैं, ताकि वे उन्हें गले लगा सकें।
मीराँबाई अपने प्रभु गिरधर नागर के चरणों में ध्यान लगाती हैं, जो उनके जीवन का उद्देश्य हैं।
इस भजन में मीराँबाई अपने कृष्ण-प्रेम और भक्ति की गहरी अभिव्यक्ति करती हैं, जो उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य है।
उनकी भक्ति और प्रेम की यह अभिव्यक्ति आज भी लोगों के दिलों में गूंजती है।

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