सखी मेरी नींद नसानी हो लिरिक्स

सखी मेरी नींद नसानी हो लिरिक्स

सखी, मेरी नींद नसानी हो।
पिवको पंथ निहारत सिगरी रैण बिहानी हो॥
सखिअन मिलकर सीख दई मन, एक न मानी हो।
बिन देख्यां कल नाहिं पड़त जिय ऐसी ठानी हो॥
अंग अंग व्याकुल भई मुख पिय पिय बानी हो।
अंतरबेदन बिरह की कोई पीर न जानी हो॥
ज्यूं चातक घनकूं रटै, मछली जिमि पानी हो।
मीरा व्याकुल बिरहणी सुद बुध बिसरानी हो॥
सखी म्हारी नींद नसानी हो।
पिय रो पंथ निहरात सब रैण बिहानी हो।।टेक।।
सखियन सब मिल सीख दयां मन एक न मानी हो।
बिन देख्यां कल ना पड़ां मन रोस णा ठानी हो।
अंग खीण व्याकुल भयाँ मुख पिय पिय वाणी हो।
अन्तर वेदन विरह री म्हारी पीड़ णा जाणी हो।
ज्यूं चातक घनकूं रटै, मछरी ज्यूं पाणी हो।
मीराँ व्याकुल बिरहणी, सुध बुध विसराणी हो।।

(नसानी=नष्ट होना, कल ना पड़ाँ=चैन नहीं मिलता, खीण=क्षीण, अन्तर=आन्तरिक, विसराणी=छोड़ दी)


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