चरन रज महिमा मैं जानी

चरन रज महिमा मैं जानी

चरन रज महिमा मैं जानी
चरन रज महिमा मैं जानी।

याहि चरनसे गंगा प्रगटी।
भगिरथ कुल तारी॥१॥
याहि चरनसे बिप्र सुदामा।
हरि कंचन धाम दिन्ही॥२॥
याहि चरनसे अहिल्या उधारी।
गौतम घरकी पट्टरानी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर।
चरनकमल से लटपटानी॥४॥
 
श्रीकृष्ण के चरणों की महिमा अनंत है—यह केवल एक भौतिक स्पर्श नहीं, बल्कि मोक्ष और कृपा की वह अनोखी शक्ति है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को शुद्ध कर सकती है। उनकी चरण रज में वह दिव्यता समाहित है, जो केवल गंगा को प्रकट करने तक सीमित नहीं, बल्कि भक्तों के हृदय को भी पवित्र करती है। जब भगिरथ के तप से गंगा अवतरित हुई, तो यह केवल जलधारा नहीं थी, बल्कि ईश्वर की कृपा का साक्षात रूप था।

श्रीकृष्ण की चरण रज का प्रभाव केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं, बल्कि यह हर भक्त की आत्मा को निर्मल करने की क्षमता रखती है। जब सुदामा उनके द्वार पर आए, तो उनकी निर्धनता केवल बाहरी थी—कृष्ण ने उन्हें न केवल धन, बल्कि प्रेम और स्नेह का वह अमूल्य उपहार दिया, जिसे कोई सांसारिक वैभव प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।

अहिल्या का उद्धार केवल एक घटना नहीं, बल्कि यह उस परम सत्य का प्रमाण है कि ईश्वर की कृपा किसी भी स्थिति में व्यक्ति को पवित्र कर सकती है। जब श्रीराम ने अपने चरणों से अहिल्या को मुक्त किया, तब यह केवल एक दंड का अंत नहीं था, बल्कि प्रेम और भक्ति की वह मधुर अभिव्यक्ति थी, जो किसी भी बाधा को समाप्त कर सकती है।

मीराँ की भक्ति इसी चरण रज में समर्पित है। जब भक्ति अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेती है, तब उसमें कोई संशय नहीं रहता—सिर्फ प्रेम और समर्पण की वह अखंड धारा, जो साधक को ईश्वर में पूर्णतः विलीन कर देती है। यही भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है, जहाँ प्रेम, श्रद्धा और आत्मसमर्पण एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं। जब आत्मा इस चरण रज को पहचान लेती है, तब उसके लिए कोई अन्य सत्य नहीं रह जाता—सिर्फ प्रभु के चरणों का नित्य स्मरण और उनकी कृपा का अनंत अनुभव।

हरि गुन गावत नाचूंगी॥
आपने मंदिरमों बैठ बैठकर। गीता भागवत बाचूंगी॥१॥
ग्यान ध्यानकी गठरी बांधकर। हरीहर संग मैं लागूंगी॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सदा प्रेमरस चाखुंगी॥३॥

तो सांवरे के रंग राची।
साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू, लोक-लाज तजि नाची।।
गई कुमति, लई साधुकी संगति, भगत, रूप भै सांची।
गाय गाय हरिके गुण निस दिन, कालब्यालसूँ बांची।।
उण बिन सब जग खारो लागत, और बात सब कांची।
मीरा श्रीगिरधरन लालसूँ, भगति रसीली जांची।।

अपनी गरज हो मिटी सावरे हम देखी तुमरी प्रीत॥ध्रु०॥
आपन जाय दुवारका छाय ऐसे बेहद भये हो नचिंत॥ ठोर०॥१॥
ठार सलेव करित हो कुलभवर कीसि रीत॥२॥
बीन दरसन कलना परत हे आपनी कीसि प्रीत।
मीरां के प्रभु गिरिधर नागर प्रभुचरन न परचित॥३॥

शरणागतकी लाज। तुमकू शणागतकी लाज॥ध्रु०॥
नाना पातक चीर मेलाय। पांचालीके काज॥१॥
प्रतिज्ञा छांडी भीष्मके। आगे चक्रधर जदुराज॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। दीनबंधु महाराज॥३॥

अब तो मेरा राम नाम दूसरा न कोई॥
माता छोडी पिता छोडे छोडे सगा भाई।
साधु संग बैठ बैठ लोक लाज खोई॥
सतं देख दौड आई, जगत देख रोई।
प्रेम आंसु डार डार, अमर बेल बोई॥
मारग में तारग मिले, संत राम दोई।
संत सदा शीश राखूं, राम हृदय होई॥
अंत में से तंत काढयो, पीछे रही सोई।
राणे भेज्या विष का प्याला, पीवत मस्त होई॥
अब तो बात फैल गई, जानै सब कोई।
दास मीरां लाल गिरधर, होनी हो सो होई॥

अब तौ हरी नाम लौ लागी।
सब जगको यह माखनचोरा, नाम धर्‌यो बैरागीं॥
कित छोड़ी वह मोहन मुरली, कित छोड़ी सब गोपी।
मूड़ मुड़ाइ डोरि कटि बांधी, माथे मोहन टोपी॥
मात जसोमति माखन-कारन, बांधे जाके पांव।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नांव॥
पीतांबर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरां, रसना कृष्ण बसै॥

बंसीवारा आज्यो म्हारे देस। सांवरी सुरत वारी बेस।।
ॐ-ॐ कर गया जी, कर गया कौल अनेक।
गिणता-गिणता घस गई म्हारी आंगलिया री रेख।।
मैं बैरागिण आदिकी जी थांरे म्हारे कदको सनेस।
बिन पाणी बिन साबुण जी, होय गई धोय सफेद।।
जोगण होय जंगल सब हेरूं छोड़ा ना कुछ सैस।
तेरी सुरत के कारणे जी म्हे धर लिया भगवां भेस।।
मोर-मुकुट पीताम्बर सोहै घूंघरवाला केस।
मीरा के प्रभु गिरधर मिलियां दूनो बढ़ै सनेस।।
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