सूना घर आंगन है सूना जहाँ भजन

सूना घर आंगन है सूना जहाँ भजन

 
सूना घर आंगन है सूना जहाँ भजन

सूना घर आंगन है सूना जहाँ
बता दो तुम बता दो गए हो कहाँ
आजा आजा तू धीर बंधाने
सारा परिवार रोता यहाँ

नाती बेटा तुम्हारे तडपते रहे
जख्म दर्दे जुदाई कैसे सहे
सोचते है कि अब अपना किसको कहे
कौन दिखलाऐगा रास्ता

कभी दुख का ना एहसास होने दिया
मुस्कुराते हुए फर्ज पूरा किया
गृहस्थ जीवन को भी ऐसे ढंग से जिया
लिख गए एक नई दास्ता

आज तरसी निगाहें बुलाए तुम्हें
दौरे रंजो अलम सब दिखाअ तुम्हें
गमे हालाते वाखिफ कराए तुम्हें
रूपगिर दे रहा वास्ता

सूना घर आंगन है सूना जहाँ
बता दो तुम बता दो गए हो कहाँ
आजा आजा तू धीर बंधाने
सारा परिवार रोता यहाँ



सुना घर आंगन है सुना जहाँ बता दो तुम गए हो कहाँ भजन सम्राट महाराज श्री रूपगिरी जी वेदाचार्य भरतपुर

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यह रचना गहरी पीड़ा, स्मृति और भावनात्मक क्षति की अनुभूति का संवेदनशील विस्तार है। परिवार के किसी प्रिय सदस्य के विछोह या उनके चले जाने के बाद, घर-आँगन एकाएक सूना और नीरस लगने लगता है। रहनुमाई और स्नेह की छाया जब खो जाती है, तो पूरा परिवार असहाय, अकेला और बेबस महसूस करता है। जिनके कारण परिवार हमेशा खुशहाल और एकजुट बना रहा, उन्हें खोकर शून्यता हर दिशा में छा जाती है।
 
Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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