चालो अगमके देस कास देखत डरै

चालो अगमके देस कास देखत डरै

चालो अगमके देस कास देखत डरै
चालो अगमके देस कास देखत डरै।
वहां भरा प्रेम का हौज हंस केल्यां करै॥
ओढ़ण लज्जा चीर धीरज कों घांघरो।
छिमता कांकण हाथ सुमत को मूंदरो॥
दिल दुलड़ी दरियाव सांचको दोवड़ो।
उबटण गुरुको ग्यान ध्यान को धोवणो॥
कान अखोटा ग्यान जुगतको झोंटणो।
बेसर हरिको नाम चूड़ो चित ऊजणो॥
पूंची है बिसवास काजल है धरमकी।
दातां इम्रत रेख दयाको बोलणो॥
जौहर सील संतोष निरतको घूंघरो।
बिंदली गज और हार तिलक हरि-प्रेम रो॥
सज सोला सिणगार पहरि सोने राखड़ीं।
सांवलियांसूं प्रीति औरासूं आखड़ी॥
पतिबरता की सेज प्रभुजी पधारिया।
गावै मीराबाई दासि कर राखिया॥
(केल्यां=खेल, बेसर,चूड़ो,बिंदली,गज,हार=आभूषणों के नाम)
 
अगम देश की यात्रा डरावनी लगती है, पर वहाँ प्रेम का सागर है, जहाँ हंस-सा मन खेलता है। लज्जा का चीर, धैर्य का घाघरा, क्षमा के कंकण, और सुमति की मूँदरी—ये भक्ति के आभूषण हैं। हृदय को प्रेम का दरिया बनाओ, सत्य को डोर, गुरु का ज्ञान उबटन, और ध्यान से मन को धो लो। कान में ज्ञान की झोंपड़ी, चित्त में हरि का नाम चूड़ा। विश्वास की पूँछी, धर्म का काजल, दया की रेखा होंठों पर, और संतोष के घुँघरू पैरों में। हरि-प्रेम का तिलक, गज और हार सजाओ। सोलह श्रृंगार कर, प्रभु की प्रीति से आँखें जोड़ो। पतिव्रता की सेज पर प्रभु विराजें, और मीराबाई की भक्ति गीत बनकर गूँजे। यह प्रेम ही है, जो मन को उस अनंत देश तक ले जाता है।
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