चालो ढाकोरमा जइ वसिये
चालो ढाकोरमा जइ वसिये
चालो ढाकोरमा जइ वसिये
चालो ढाकोरमा जइ वसिये। मनेले हे लगाडी रंग रसिये॥टेक॥
प्रभातना पोहोरमा नौबत बाजे। अने दर्शन करवा जईये॥१॥
अटपटी पाघ केशरीयो वाघो। काने कुंडल सोईये॥२॥
चालो ढाकोरमा जइ वसिये। मनेले हे लगाडी रंग रसिये॥टेक॥
प्रभातना पोहोरमा नौबत बाजे। अने दर्शन करवा जईये॥१॥
अटपटी पाघ केशरीयो वाघो। काने कुंडल सोईये॥२॥
पिवळा पितांबर जर कशी जामो। मोतन माळाभी मोहिये॥३॥
चंद्रबदन आणियाळी आंखो। मुखडुं सुंदर सोईये॥४॥
रूमझुम रूमझुम नेपुर बाजे। मन मोह्यु मारूं मुरलिये॥५॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। अंगो अंग जई मळीयेरे॥६॥
चंद्रबदन आणियाळी आंखो। मुखडुं सुंदर सोईये॥४॥
रूमझुम रूमझुम नेपुर बाजे। मन मोह्यु मारूं मुरलिये॥५॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। अंगो अंग जई मळीयेरे॥६॥
प्रभात की वेला में जब नौबत की ध्वनि गूंजती है, तब यह केवल संगीत नहीं, बल्कि भक्ति का वह मधुर स्वर होता है, जो भक्त को अपने प्रभु की ओर आकर्षित करता है। जब श्रीकृष्ण के दिव्य रूप को देखा जाता है, तो यह केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि प्रेम और श्रद्धा की उस उच्चतम अनुभूति का प्रतीक होता है, जिसमें भक्त अपना समस्त अस्तित्व समर्पित कर देता है।
उनकी पीतांबर धारण करने की छवि, मोतियों की माला, कुंडलों की झलक, और उनके मुख की अद्भुत शोभा केवल देखने योग्य नहीं, बल्कि अनुभव करने योग्य होती है। यह सौंदर्य केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि ईश्वरीय प्रेम की गहनता को प्रकट करता है। जब इस अनुभूति में व्यक्ति रम जाता है, तब उसकी प्रत्येक सांस ईश्वर की स्मृति में विलीन हो जाती है।
मीराँ की भक्ति इसी प्रेम की पराकाष्ठा को प्रकट करती है। जब भक्त हरि के गुणों में रम जाता है, तब वह केवल भक्ति में नृत्य करता है, शास्त्रों का अध्ययन करता है, और ग्यान तथा ध्यान की गठरी बांधकर ईश्वर के संग यात्रा करता है। यही भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है, जहाँ प्रेम, श्रद्धा और आत्मसमर्पण एक-दूसरे में पूर्ण रूप से विलीन हो जाते हैं। यह आनंद केवल बाहरी नहीं, बल्कि भीतर की अनुभूति है, जो आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट करती है।
हरि गुन गावत नाचूंगी॥
आपने मंदिरमों बैठ बैठकर। गीता भागवत बाचूंगी॥१॥
ग्यान ध्यानकी गठरी बांधकर। हरीहर संग मैं लागूंगी॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सदा प्रेमरस चाखुंगी॥३॥
तो सांवरे के रंग राची।
साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू, लोक-लाज तजि नाची।।
गई कुमति, लई साधुकी संगति, भगत, रूप भै सांची।
गाय गाय हरिके गुण निस दिन, कालब्यालसूँ बांची।।
उण बिन सब जग खारो लागत, और बात सब कांची।
मीरा श्रीगिरधरन लालसूँ, भगति रसीली जांची।।
आपने मंदिरमों बैठ बैठकर। गीता भागवत बाचूंगी॥१॥
ग्यान ध्यानकी गठरी बांधकर। हरीहर संग मैं लागूंगी॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सदा प्रेमरस चाखुंगी॥३॥
तो सांवरे के रंग राची।
साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू, लोक-लाज तजि नाची।।
गई कुमति, लई साधुकी संगति, भगत, रूप भै सांची।
गाय गाय हरिके गुण निस दिन, कालब्यालसूँ बांची।।
उण बिन सब जग खारो लागत, और बात सब कांची।
मीरा श्रीगिरधरन लालसूँ, भगति रसीली जांची।।