चालो मन गंगा जमुना तीर
चालो मन गंगा जमुना तीर
चालो मन गंगा जमुना तीर
चालो मन गंगा जमुना तीर।
गंगा जमुना निरमल पाणी सीतल होत सरीर।
बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लियो बलबीर॥
चालो मन गंगा जमुना तीर।
गंगा जमुना निरमल पाणी सीतल होत सरीर।
बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लियो बलबीर॥
मोर मुगट पीताम्बर सोहे कुण्डल झलकत हीर।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरण कंवल पर सीर॥
जब मन गंगा और जमुना के पवित्र तटों की ओर अग्रसर होता है, तब यह केवल जल में स्नान की आकांक्षा नहीं होती, बल्कि आत्मा की शुद्धि और ईश्वर के समीप जाने की इच्छा भी होती है। इन पवित्र नदियों का स्पर्श केवल शरीर को शीतलता प्रदान नहीं करता, बल्कि हृदय को भी निर्मल करता है, जिससे व्यक्ति भक्ति की उच्चतम अवस्था में प्रवेश कर सके।मीराके प्रभु गिरधर नागर चरण कंवल पर सीर॥
श्रीकृष्ण का मधुर स्वरूप इस प्रेमपूर्ण यात्रा को और अधिक दिव्यता प्रदान करता है। उनकी बंसी से निकलने वाली मधुर ध्वनि केवल संगीत नहीं, बल्कि प्रेम और अनुराग की वह गहन पुकार होती है, जो प्रत्येक साधक को उनके चरणों की ओर आकर्षित करती है। जब वे गाते और खेलते हैं, तब यह केवल लीला नहीं, बल्कि आत्मा की उस चेतना का जागरण होता है, जो सांसारिक भ्रम से ऊपर उठकर ईश्वर के प्रेम में पूर्णतः समर्पित हो जाती है।
मोर मुकुट और पीतांबर केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि ईश्वरीय आनंद की अभिव्यक्ति हैं। जब उनका स्वरूप कुण्डलों की झलक के साथ प्रकाशित होता है, तब यह कोई साधारण दृश्य नहीं होता—यह तो आत्मा की वह अनुभूति होती है, जहाँ ईश्वर की उपस्थिति संपूर्ण रूप से अनुभव की जाती है। जब इस भाव में व्यक्ति रम जाता है, तब उसके लिए कोई अन्य सत्य नहीं रहता—सिर्फ प्रभु के चरणों की मधुर छाया रह जाती है।
मीराँ की भक्ति इसी अनुराग की पराकाष्ठा है। जब प्रेम अपने शुद्धतम स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, तब उसमें कोई द्वंद्व नहीं, कोई संशय नहीं—केवल उस अटूट श्रद्धा और समर्पण की अखंड धारा, जो साधक को ईश्वर में पूर्णतः विलीन कर देती है। यही भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है, जहाँ प्रेम, श्रद्धा और आत्मसमर्पण एक-दूसरे में पूर्ण रूप से समाहित हो जाते हैं।
हरि गुन गावत नाचूंगी॥
आपने मंदिरमों बैठ बैठकर। गीता भागवत बाचूंगी॥१॥
ग्यान ध्यानकी गठरी बांधकर। हरीहर संग मैं लागूंगी॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सदा प्रेमरस चाखुंगी॥३॥
आपने मंदिरमों बैठ बैठकर। गीता भागवत बाचूंगी॥१॥
ग्यान ध्यानकी गठरी बांधकर। हरीहर संग मैं लागूंगी॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सदा प्रेमरस चाखुंगी॥३॥