जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन। सबद सुणत मेरी छतियां, कांपै मीठे लागै बैन। बिरह व्यथा कांसू कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन। कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन। मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख देन।
इस भक्तिमय कविता में मीरा बाई अपने प्रभु श्री कृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम और विरह की पीड़ा को व्यक्त कर रही हैं। वह कहती हैं कि "दरस बिन दूखण लागे नैन," यानी प्रभु के दर्शन के बिना उनकी आँखों में केवल दुख ही दुख भर जाता है। जब से वे अपने प्रिय प्रभु से बिछड़ी हैं, उन्हें कभी भी शांति नहीं मिली।
उनके कानों में भगवान के शब्दों की ध्वनि सुनने से मन में मीठी तृप्ति होती है, लेकिन विरह की पीड़ा इस कदर बढ़ गई है कि वह उसकी व्यथा को व्यक्त करने के लिए शब्द भी नहीं पा रही हैं। उनका मन लगातार भगवान की तलाश में है, लेकिन अभी तक उन्हें कोई समाधान नहीं मिल पाया। वह प्रभु से विनती करती हैं कि वह शीघ्र ही उनके पास आएं और उनके दुखों को समाप्त करके सुख प्रदान करें। इस प्रकार, मीरा बाई की यह कविता उनके प्रभु से मिलने की आकांक्षा और विरह की पीड़ा को व्यक्त करती है।
Dookhan Laagai Nain Daras Bin - Mirabai Ji - RSSB Shabad
बरजी मैं काहूकी नाहिं रहूं। सुणो री सखी तुम चेतन होयकै मनकी बात कहूं॥ साध संगति कर हरि सुख लेऊं जगसूं दूर रहूं। तन धन मेरो सबही जावो भल मेरो सीस लहूं॥ मन मेरो लागो सुमरण सेती सबका मैं बोल सहूं।
मीरा के प्रभु हरि अविनासी सतगुर सरण गहूं॥ राणाजी, म्हांरी प्रीति पुरबली मैं कांई करूं॥
राम नाम बिन नहीं आवड़े, हिबड़ो झोला खाय। भोजनिया नहीं भावे म्हांने, नींदडलीं नहिं आय॥
विष को प्यालो भेजियो जी, `जाओ मीरा पास,' कर चरणामृत पी गई, म्हारे गोविन्द रे बिसवास॥
बिषको प्यालो पीं गई जीं,भजन करो राठौर, थांरी मीरा ना मरूं, म्हारो राखणवालो और॥
छापा तिलक लगाइया जीं, मन में निश्चै धार,
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रामजी काज संवारियाजी, म्हांने भावै गरदन मार॥
पेट्यां बासक भेजियो जी, यो छै मोतींडारो हार, नाग गले में पहिरियो, म्हारे महलां भयो उजियार॥
राठोडांरीं धीयड़ी दी, सींसाद्यो रे साथ। ले जाती बैकुंठकूं म्हांरा नेक न मानी बात॥
मीरा दासी श्याम की जी, स्याम गरीबनिवाज। जन मीरा की राखज्यो कोइ, बांह गहेकी लाज॥ राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊं ए माय। मैं मंदभागण परम अभागण, कीरत कैसे गाऊं ए माय॥
बिरह पिंजरकी बाड़ सखी रीं,उठकर जी हुलसाऊं ए माय। मनकूं मार सजूं सतगुरसूं, दुरमत दूर गमाऊं ए माय॥
डंको नाम सुरतकी डोरी, कड़ियां प्रेम चढ़ाऊं ए माय। प्रेम को ढोल बन्यो अति भारी, मगन होय गुण गाऊं ए माय॥
तन करूं ताल मन करूं ढफली, सोती सुरति जगाऊं ए माय। निरत करूं मैं प्रीतम आगे, तो प्रीतम पद पाऊं ए माय॥