जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे काको नाम भजन
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे काको नाम भजन
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारेजाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे,
काको नाम पतित पावन जग,केहि अति दीन पियारे,
कौन देव बिराई बिरद हित,हठि हठि अधम उधारे,
खग मृग व्याध पाषाण बिटप जड,यवन कवन सुर तारे,
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
देव दनुज मुनि नाग मनुज सब,माया बिबस बिचारे,
तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु कहां अपनपौ हारे,
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
Jaau Kaha Taji Charan Tumhare - Osman Mir
Jaoon Kahaan Taji Charan Tumhaare,
Kaako Naam Patit Paavan Jag,kehi Ati Deen Piyaare,
Kaako Naam Patit Paavan Jag,kehi Ati Deen Piyaare,
चरणों को छोड़कर जाएं तो जाएं कहां, पतितों को पावन बनाने वाले दीनों के प्यारे। कौन देव बिरह की पीड़ा सहकर हठी अधमों को उभारे। खग मृग व्याध पाषाण बिटप जड़ यवन—सब तर जाते उनके नाम से। इश्वर का आशर्वाद है जो देव दनुज मुनि नाग मनुज सब माया बंधन से मुक्त कर देता। दास तुलसी कहते हैं निज हाथ हार गए तो अपनों को थाम लेते हैं।
ये नेह ऐसा बांधता कि दुनिया की राहें भूल जाएं। हर जीव को अपनी गोद में जगह मिले। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री राम जी।
ये नेह ऐसा बांधता कि दुनिया की राहें भूल जाएं। हर जीव को अपनी गोद में जगह मिले। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री राम जी।