तुम जगत की ज्योति हो तुम धरा के नमक सोंग
तुम धरा के नमक भी हो
तुमको पैदा इसलिये किया
तुमको जीवन इसलिये मिला
उसकी मर्ज़ी कर सको सदा
तुम जगत की ज्योति हो
वो नगर जो बसे शिखर पर
छिपता ही नहीं, किसी की नज़र
तुम्हारे भले काम
चमके इस तरह
तुम जगत की ज्योति हो
पड़ोसी से प्रेम, तुमने सुना है
दुश्मनों से प्रेम मेरा कहना है
तब ही तुम संतान
परमेश्वर समान,
तुम जगत की ज्योति हो
आँख के बदले आँख, बुराई का सामना है
फेरो दूसरा गाल, सह लो सब अन्याय
ऐसा जीवन ही
पिता को भाता है,
तुम जगत की ज्योति हो
Tum jagat ki jyoti ho, tum dhara ke namak bhi ho - तुम जगत की ज्योति हो, तुम धरा के नमक भी हो
जब अंधेरा घना हो जाए और राहें अनजान लगें, तो साधक समझता है कि वो जगत की ज्योति बनकर चमक सकता है। परमेश्वर जी ने जीवन दिया ताकि हर कदम पर उनकी मर्जी निभे, भले कामों से ऐसा प्रकाश फैले जैसे शिखर पर बसा नगर कभी न छिपे। पड़ोसी से प्रेम तो सुना ही है, दुश्मनों को भी दिल से अपनाओ, तब ही परमेश्वर की संतान बनने का सच्चा एहसास होता। इश्वर का आशर्वाद यही तो है कि हर नजर में रोशनी बिखरे।
आँख के बदले आँख का दौर चल रहा हो, बुराई सामने खड़ी हो, तो दूसरा गाल फेर दो, अन्याय सह लो—यही वो रास्ता है जो पिता को भाता। साधक का जीवन ऐसा बने कि दूर से ही लोग आकर्षित हों, प्रेम की लौ जलाएं। ये छोटी-छोटी कोशिशें ही दुनिया को नमक की तरह स्वाद देती हैं, बेस्वाद न बन जाए। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री यीशु मसीह जी की।
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Author - Saroj Jangir
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