मैं निजाम से नैना लगा आई रे सूफी सोंग
मैं निजाम से नैना लगा आई रे सूफी सोंग
हो ढोला रे ढोला
ढोला रे मेंढा ढोला
साजन प्रीत लगाई के
पिया दूर देस मत जा
साजन प्रीत लगाई के
इब दूर देस मत जा
बसो हमारी नागरी
हम मांगे तू खा
साजन प्रीत लगाई के
पिया दूर देस मत जा
बसो हमारी नागरी
हम मांगे तू खा
ख़ुसरो नदिया प्रेम की
ख़ुसरो नदिया प्रेम की
उलटी वा की धार
ख़ुसरो नदिया प्रेम की
सो उलटी वा की धार
जो निकला सो तो डूब गया
जो निकला सो तो डूब गया
और जो डूबा सो हुआ पार
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
घर-नारी गंवारी..
वे बुल्ल्या...
वे बुल्ल्या चल ओत्थे चलिए
वे बुल्ल्या चल ओत्थे चलिए
जित्थे रहंदे सारे अन्ने
वे बुल्ल्या चल ओत्थे चलिए
जित्थे रहंदे सारे अन्ने
न कोई साड्डी ज़ात पहचाने
न कोई साड्डी ज़ात पहचाने
न कोई सान्नु मन्ने
मैं निजाम से नैना..
अरे मनमोहन से नैना
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
मैं निजाम
वहम-ए-दुई भी कुफ़्र है
वहम-ए-दुई भी कुफ़्र है
एक वजूद, एक ज़ात
मैं निजाम की नैना लगा आई रे
सोहनी सूरत, मोहनी मूरत
सोहनी सूरत, मोहनी मूरत वा की
एक सुरतिया की दो हैं मुरतिया
एक सुरतिया की दो हैं मुरतिया
एक राम और एक रहीम
भूल भी जाइये कहीं
भूल भी जाइये कहीं
सारी इज़ाफ़तों की बात
सारी इज़ाफ़तों की बात
वहम-ए-दुई भी कुफ़्र है
एक वजूद, एक ज़ात
सोहनी सूरत, मोहनी मूरत
मैं तो हृदय बीच समा आई रे
मैं तो हृदय बीच समा आई रे
ख़ुसरो निजाम के बल बल जईये
वा के बल बल जईये
ख़ुसरो निजाम के बल बल जईये
वा के बल बल जईये
ख़ुसरो निजाम के बल बल जईये
मैं तो अनमोल चेरी बिक आई रे
मैं तो अनमोल चेरी बिक आई रे
घर-नारी गंवारी
'Main Nijaam Se Naina' by Farid Ayaz & Abu Mohammed (2009)
ढोला रे मेंढा ढोला
साजन प्रीत लगाई के
पिया दूर देस मत जा
साजन प्रीत लगाई के
इब दूर देस मत जा
बसो हमारी नागरी
हम मांगे तू खा
साजन प्रीत लगाई के
पिया दूर देस मत जा
बसो हमारी नागरी
हम मांगे तू खा
ख़ुसरो नदिया प्रेम की
ख़ुसरो नदिया प्रेम की
उलटी वा की धार
ख़ुसरो नदिया प्रेम की
सो उलटी वा की धार
जो निकला सो तो डूब गया
जो निकला सो तो डूब गया
और जो डूबा सो हुआ पार
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
घर-नारी गंवारी..
वे बुल्ल्या...
वे बुल्ल्या चल ओत्थे चलिए
वे बुल्ल्या चल ओत्थे चलिए
जित्थे रहंदे सारे अन्ने
वे बुल्ल्या चल ओत्थे चलिए
जित्थे रहंदे सारे अन्ने
न कोई साड्डी ज़ात पहचाने
न कोई साड्डी ज़ात पहचाने
न कोई सान्नु मन्ने
मैं निजाम से नैना..
अरे मनमोहन से नैना
मैं निजाम से नैना लगा आई रे
घर-नारी गंवारी चाहे सो कहे
मैं निजाम
वहम-ए-दुई भी कुफ़्र है
वहम-ए-दुई भी कुफ़्र है
एक वजूद, एक ज़ात
मैं निजाम की नैना लगा आई रे
सोहनी सूरत, मोहनी मूरत
सोहनी सूरत, मोहनी मूरत वा की
एक सुरतिया की दो हैं मुरतिया
एक सुरतिया की दो हैं मुरतिया
एक राम और एक रहीम
भूल भी जाइये कहीं
भूल भी जाइये कहीं
सारी इज़ाफ़तों की बात
सारी इज़ाफ़तों की बात
वहम-ए-दुई भी कुफ़्र है
एक वजूद, एक ज़ात
सोहनी सूरत, मोहनी मूरत
मैं तो हृदय बीच समा आई रे
मैं तो हृदय बीच समा आई रे
ख़ुसरो निजाम के बल बल जईये
वा के बल बल जईये
ख़ुसरो निजाम के बल बल जईये
वा के बल बल जईये
ख़ुसरो निजाम के बल बल जईये
मैं तो अनमोल चेरी बिक आई रे
मैं तो अनमोल चेरी बिक आई रे
घर-नारी गंवारी
'Main Nijaam Se Naina' by Farid Ayaz & Abu Mohammed (2009)
एक साजन हैं जिनसे मैंने प्रीत लगा ली है – अब उनसे विनती कर रही हूँ कि हे प्रियतम, तुम दूर देश मत जाओ, मेरी ही बस्ती में बस जाओ, मेरे ही नगर में ठहर जाओ; मैं तो बस तुमको ही माँगती हूँ, तुम्हीं को चाहती हूँ। प्रेम की नदी अजीब है – ख़ुसरो कहते हैं कि यह प्रेम की ऐसी नदी है जिसकी धारा उलटी बहती है: जो सतह पर तैरने की कोशिश करता है, वह डूब जाता है, और जो खुद को डुबो देता है, वही उस पार पहुँच जाता है। घर की औरतें, पड़ोस की औरतें जो चाहे कहें, मुझे उनकी परवाह नहीं; मैं तो निज़ाम (हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया) से नैन मिला आई हूँ, अपने मनमोहक प्रिय से आँखें मिला आई हूँ।
सूफी नज़र से देखा जाए तो एक ही सूरत (प्रेम) की दो मूर्तियाँ हैं – एक को राम कहते हैं, दूसरी को रहीम; असल में दोनों एक ही सत्य के रूप हैं। इसीलिए कहा जाता है: ज़ुल्म और नेमत, बढ़त और कमी, इन सब बातों को भूल जाओ; दो होने का वहम (द्वैत) भी कुफ़्र है – असल में तो एक ही वजूद है, एक ही ज़ात है। उसी एक की सोहनी सूरत, मोहनी मूर्ति मेरे दिल के बीचोंबीच आ बसी है; मैं तो उसी की हो गई हूँ, बाकी दुनिया जो चाहे कहे। ख़ुसरो कहते हैं कि मैं निज़ाम पर बार‑बार निछावर जाऊँ, उनके ऊपर अपने आपको बार‑बार कुर्बान कर दूँ; मैं तो एक अनमोल दासी की तरह खुद को बेच आई हूँ, अपनी नफ़्स, अपना अहं, सब उन पर वार दिया है – अब घर‑परिवार की, दुनिया की निंदा‑प्रशंसा का मुझ पर कोई असर नहीं, मैं तो अपने महबूब की हो चुकी हूँ।
सूफी नज़र से देखा जाए तो एक ही सूरत (प्रेम) की दो मूर्तियाँ हैं – एक को राम कहते हैं, दूसरी को रहीम; असल में दोनों एक ही सत्य के रूप हैं। इसीलिए कहा जाता है: ज़ुल्म और नेमत, बढ़त और कमी, इन सब बातों को भूल जाओ; दो होने का वहम (द्वैत) भी कुफ़्र है – असल में तो एक ही वजूद है, एक ही ज़ात है। उसी एक की सोहनी सूरत, मोहनी मूर्ति मेरे दिल के बीचोंबीच आ बसी है; मैं तो उसी की हो गई हूँ, बाकी दुनिया जो चाहे कहे। ख़ुसरो कहते हैं कि मैं निज़ाम पर बार‑बार निछावर जाऊँ, उनके ऊपर अपने आपको बार‑बार कुर्बान कर दूँ; मैं तो एक अनमोल दासी की तरह खुद को बेच आई हूँ, अपनी नफ़्स, अपना अहं, सब उन पर वार दिया है – अब घर‑परिवार की, दुनिया की निंदा‑प्रशंसा का मुझ पर कोई असर नहीं, मैं तो अपने महबूब की हो चुकी हूँ।
Lead Vocals & Harmonium: Fariduddin Ayaz & Abu Mohammed
Chorus & Clapping: Ghulam Akram, Ali Akbar, Gayoor Ahmed,
Chorus & Clapping: Ghulam Akram, Ali Akbar, Gayoor Ahmed,
Lead Vocals & Harmonium: Fariduddin Ayaz & Abu Mohammed
Moiz-uddin, Mubark Haris, Zarrar Ahmed, Shah Laeegh-uddin, Shehzad Hussain
Dholak: Muhammad Ashfa, Muhammad Nawab Kallan
Translation: Vipul Rikhi
Video Credits:
Cameras: Tahireh Lal & Vinay Dhodgeri
Editing: Shruti Kulkarni
Sound: Dipanshu Mitra
Sub-Titling: Anand Baskaran & Vipul Rikhi
Collection: The Kabir Project
Moiz-uddin, Mubark Haris, Zarrar Ahmed, Shah Laeegh-uddin, Shehzad Hussain
Dholak: Muhammad Ashfa, Muhammad Nawab Kallan
Translation: Vipul Rikhi
Video Credits:
Cameras: Tahireh Lal & Vinay Dhodgeri
Editing: Shruti Kulkarni
Sound: Dipanshu Mitra
Sub-Titling: Anand Baskaran & Vipul Rikhi
Collection: The Kabir Project
आपको ये पोस्ट पसंद आ सकती हैं
