मीरा की लागी लगन गोपाल से भजन

मीरा की लागी लगन गोपाल से भजन

मीरा की लागी लगन गोपाल से भजन Meera Ki Laagi Lagan Gopal Se Bhajan

मीरा की लागी लगन गोपाल से,
मिलने आयी वृन्दावन नंदलाल से,
मिलने आयी वृन्दावन नंदलाल से,
मीरा की लागी लगन गोपाल से।

आप ठाकुर मैं पुजारन आपकी,
आप ठाकुर मैं पुजारन आपकी,
मीरा यूह हंस कर कहे गोपाल से,
मीरा की लागी लगन गोपाल से।
गोविन्द जय जय गोपाल जय जय,
राधा रमन हरी गोविन्द जय जय,

मेरे तो गिरधर सिवा कोई नहीं
मेरे तो गिरधर सिवा कोई नहीं
प्रीत हैं साची मेरी गोपाल से
मीरा की लागी लगन गोपाल से।
नटवर नागर नंदा भजो रे मन गोविंदा,
सावली सूरत मुख चंदा भजो रे मन गोविंदा,

मैं हूँ दुल्हन श्याम की राणा सुनो
मैं हूँ दुल्हन श्याम की राणा सुनो
डोर जीवन की बंधी गोपाल से
मीरा की लागी लगन गोपाल से।
अच्चुतम केशवम कृष्णा दामोदरं
राम नारायणं जानकी बल्लभम

संत मंगल मीरा तू धन्य हुई
संत मंगल मीरा तू धन्य हुई
मिल गयी ज्योति तेरी गोपाल से
मीरा की लागी लगन गोपाल से।
श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी,  है नाथ नारायण वासुदेवा
श्री राम राघव रघुवर से प्यारे, है नाथ नारायण वासुदेवा

Meera ki laagi lagan gopal se by Shree Navratan giri ji Maharaj

गायक : Navratan giri ji Maharaj

मीरा बाई का यह भजन उनकी भगवान कृष्ण (गोपाल, नंदलाल, गिरधर) के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति को दर्शाता है। मीरा कहती हैं कि उनका मन वृंदावन में नंदलाल से मिलने को आतुर है, क्योंकि उनकी आत्मा गोपाल के प्रेम में डूबी है। वे स्वयं को कृष्ण की पुजारन और दुल्हन मानती हैं, जिनका जीवन गोपाल की भक्ति की डोर से बंधा है। मीरा के लिए कृष्ण के सिवा कोई और नहीं; उनकी प्रीत सच्ची और अटल है। वे अपने मन को गोविंद के गुण गाने और उनकी सांवली सूरत व चांद-से मुख की भक्ति करने को कहती हैं। भजन में कृष्ण के विभिन्न नामों—अच्युत, केशव, दामोदर, राम, नारायण—का जाप है, जो उनकी महिमा को और गहराता है। अंत में, मीरा को संतों के बीच धन्य माना गया, क्योंकि उनकी भक्ति की ज्योति गोपाल से मिल गई। यह भजन मीरा की भक्ति, प्रेम और समर्पण की अमर कहानी को जीवंत करता है।

मीराबाई की भक्ति प्रेम और समर्पण का अनुपम उदाहरण है, जो कृष्ण के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को दर्शाती है। उन्होंने समाज और परिवार की सभी बाधाओं को पार कर श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व माना। मीरा की भक्ति किसी रीति-रिवाज या दिखावे पर आधारित नहीं थी, बल्कि यह उनके हृदय से निकली एक सहज और सच्ची भावना थी। उन्होंने कृष्ण को अपना पति मानकर उनके लिए भजन और गीत रचे, जो आज भी कृष्ण भक्तों द्वारा गाए जाते हैं। उनके लिए कृष्ण सिर्फ एक देवता नहीं, बल्कि एक जीवित साथी थे जिनके साथ वे हर पल जुड़ी रहती थीं। मीरा की भक्ति यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम और विश्वास ही ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सीधा मार्ग है। 

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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