जब लगि भगति सकांमता मीनिंग

जब लगि भगति सकांमता मीनिंग

जब लगि भगति सकांमता, तब लग निर्फल सेव।
कहै कबीर वै क्यूं मिलैं, निहकामी निज देव॥

Jab Lagi Bhagati Sakaanmta, Tab Lag Nirfal Sev,
Kahe Kabir Ve Kyu Mile, Nihkaami Nij Dev.
 
जब लगि भगति सकांमता, तब लग निर्फल सेव। कहै कबीर वै क्यूं मिलैं, निहकामी निज देव॥
 

जब लगि : जब तक।
सकांमता : कामनायुक्त, कामना की इच्छा रखे हुए।
तब लग : तब तक।
निर्फल : व्यर्थ, निष्फल।
सेव : सेवा।
वै क्यूं मिलैं : वह क्यों मिलेगा।
निहकामी : निष्कामी।
निज देव : ईश्वर। 

यदि तुम्हारी भक्ति सकाम है, स्वार्थ जनित है तो कैसे इश्वर की प्राप्ति संभव हो पाती है. इश्वर कामना रहित है, यदि सकाम उसे प्राप्त करने की कोई इच्छा करता है तो यह संभव नहीं है. कामना रहित होकर यदि इश्वर का सुमिरण किया जाए तभी उसकी प्राप्ति संभव हो पाती है. जब तक कामना है, कुछ पाने का सांसारिक स्वार्थ है, वह माया से ही सलग्न रहता है. माया से ऊपर उठ कर ही जीवात्मा परमात्मा के

समीप जा सकती है.
स्वारथ का सब कोई सगा,
सारा ही जग जान |
बिन स्वारथ आदर करे,
सो नर चतुर सुजान ||
संसारी से प्रीतड़ी,
सरै न एको काम |
दुविधा में दोनों गये,
माया मिली न राम ||
 
संत कबीर दास जी के दोहे जीवन के गहन सत्य को बहुत ही सरल शब्दों में व्यक्त करते हैं। इन दोहों में भक्ति, ज्ञान, अहंकार का त्याग, सच्चाई और ईश्वर के प्रति समर्पण जैसे विषय प्रमुख रूप से मिलते हैं। कबीर जी की वाणी निर्गुण भक्ति की धारा से जुड़ी हुई है, जहाँ वे बाहरी दिखावे, जाति-पाति और रूढ़ियों की आलोचना करते हुए मनुष्य को आत्म-चिंतन की ओर प्रेरित करते हैं। उनका प्रत्येक दोहा एक दर्पण की तरह है जो हमारे अंदर छिपे दोषों को उजागर करता है और सही मार्ग दिखाता है।

एक प्रसिद्ध दोहा है - "गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥" इस दोहे का अर्थ है कि जब गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों सामने खड़े हों तो पहले गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर का मार्ग बताया है। यह दोहा गुरु की महिमा बताता है और सिखाता है कि आध्यात्मिक यात्रा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना जाता है। कबीर जी कहते हैं कि बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त करना असंभव है।
दूसरा महत्वपूर्ण दोहा है - "मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा॥" इसका भावार्थ है कि मेरे पास अपना कुछ भी नहीं है, जो भी है सब तेरी (ईश्वर की) देन है। मैं सब कुछ तुझे सौंप देता हूँ, इसमें मेरी क्या हानि है? यह दोहा पूर्ण समर्पण और अहंकार त्याग की शिक्षा देता है, जो कबीर की भक्ति का मूल तत्व है। ऐसे दोहे आज भी लोगों को सच्चाई और विनम्रता का पाठ पढ़ाते हैं। 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं कबीर के दोहों को अर्थ सहित, कबीर भजन, आदि को सांझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें

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