सत री संगत गंगा गोमती सरस्वती कासी भजन
सत री संगत गंगा गोमती सरस्वती कासी भजन
इस भजन में सतसंगत के महत्त्व को दर्शाया गया है और वर्णन है की सत्संगत सरसवती, काशी और प्रयाग, और गंगा गोमती के समान है। जैसे यहाँ पर आकर स्नान करने से जीव पाप मुक्त हो जाता है वैसे ही सत्संगत करने से ही कुबुद्धि दूर होती है और यम /मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। भक्ति ध्रुव और प्रह्लाद जी ने नारद से सत्संगत किया जिसके परिणाम स्वरुप बैकुंठ मैं स्थान पाया। लाखों प्राणी सत की संगत करके भव सागर से पार हो गए हैं, आवागमन से मुक्त हो गए हैं।
सत्य की संगत ऐसी है जैसे अहिल्या ईश्वर के चरणों की रज मात्र से ही भव सागर पार हो गई है और जो रज अहिल्या की है उसे हाथी ढूंढ रहे हैं की वे भी उस रज के सम्पर्क में आने से आवागमन से मुक्त हो सकें।
रे भाई सत री संगत गंगा गोमती,
सरस्वती कासी परीयागा,
लाखों पापीडा इण में उबरया,
डर जमड़ो रो भागा।
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, ध्रुव जी और प्रहलाद जी,
सतसंग नारद जी से किन्हीं,
विष्णुपुरी बैकुंठ में,
सुरपति आदर ज्याने दीन्हीं,
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, रतना करमा सबरी भीलणी,
सेना धन्ना और नापाँ,
सतसंग रे प्रताप सूं,
पाई उत्तम धामा,
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, शेषखाना रो एक बादशाह,
नरपत कन्या चित्त लाही,
सतसंग रे प्रताप सूं,
भूपा भेंट चढ़ाई,
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, तपोवर भूमि स्यूं रघुवर निसरया,
रज चरणा री लागी,
चरण पखारत अहिल्या उबरी ,
दिल री दुरमती भागी,
सत री संगत गंगा गोमती।
धूळ धरे गज सीस पे,
ईश्वर के मन भाई,
जिण रज स्यूं अहिल्या उबरी,
वो रज खोजै गजराई,
सत री संगत गंगा गोमती।
सरस्वती कासी परीयागा,
लाखों पापीडा इण में उबरया,
डर जमड़ो रो भागा।
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, ध्रुव जी और प्रहलाद जी,
सतसंग नारद जी से किन्हीं,
विष्णुपुरी बैकुंठ में,
सुरपति आदर ज्याने दीन्हीं,
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, रतना करमा सबरी भीलणी,
सेना धन्ना और नापाँ,
सतसंग रे प्रताप सूं,
पाई उत्तम धामा,
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, शेषखाना रो एक बादशाह,
नरपत कन्या चित्त लाही,
सतसंग रे प्रताप सूं,
भूपा भेंट चढ़ाई,
सत री संगत गंगा गोमती।
ऐ भाई, तपोवर भूमि स्यूं रघुवर निसरया,
रज चरणा री लागी,
चरण पखारत अहिल्या उबरी ,
दिल री दुरमती भागी,
सत री संगत गंगा गोमती।
धूळ धरे गज सीस पे,
ईश्वर के मन भाई,
जिण रज स्यूं अहिल्या उबरी,
वो रज खोजै गजराई,
सत री संगत गंगा गोमती।
रे भाई सत री संगत गंगा गोमती,
सरस्वती कासी परीयागा,
लाखों पापीडा इण में उबरया,
डर जमड़ो रो भागा।
सत री संगत गंगा गोमती।
सरस्वती कासी परीयागा,
लाखों पापीडा इण में उबरया,
डर जमड़ो रो भागा।
सत री संगत गंगा गोमती।
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Author - Saroj Jangir
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