निवण करू गुरु जम्भ ने गुरु जम्भेश्वर साखी

निवण करू गुरु जम्भ ने गुरु जम्भेश्वर साखी

निवण करूं गुरु जंभ ने,
निरु निरमल भाव,
कर जोड़े बंधु चरण,
शीश नवाया नवाय।।

निवण, खिवण,
सब सुं आदर भाव,
कह केशो सोई बड़ा,
जा में घण छिभाव।।

आम फले नीचो निवे,
एरड़ ऊंचो जाय,
नुगर सुगर की पारखा,
कह केशो समझाय।।

आवो मिलो,
सिवंरो सिरजनहार,
सतगुरु सत पंथ चालियो,
खरतर खांडा धार।।

जंभेश्वर जिभिया जपो,
भीतर छोड़ विकार,
संपती सिरजनहार की,
विधि सुं सुण विचार।।

अवसरी ढील न कीजिए,
भलैन लाभै वार,
जंभ राजा वांसे वहै,
तलबी कियो तियार।।

चहरी वस्तु न चाखिए,
उर पर तजि अहंकार,
बाड़े हूंता विछड़्या जारी,
सतगुरु करसी सार।।

सेरी सिवंरण प्राणियां,
अंतर बड़ा आधार,
परनिंदा पापा सिरे,
भूली उठाए भार।।

परलै होयसी पाप सुं,
मूर्ख सहसी मार,
पाछे ही पछतावसी,
पापा तणि पहार।।

ओगण गारो आदमी,
इलारै उर भार,
कह 'केशो' करणि करो,
पावो मोक्ष द्वार।।

निवण करूं गुरु जंभ ने,
निरु निरमल भाव,
कर जोड़े बंधु चरण,
शीश नवाया नवाय।।


जम्भेश्वर साखी निवण करू गुरू जम्भ ने नीऊ निर्मल भाव राजू महाराज Nivan Karu Guru Jambh Ne

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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