हे नारायण मुझे बता दो निर्धन भजन
हे नारायण मुझे बता दो निर्धन भजन
धनवानो का मान जगत में,निर्धन का सम्मान नहीं,
हे नारायण मुझे बता दो,
निर्धन क्या इंसान नहीं।
एक को देते सुख का साधन,
दूजे को दुख देते हो,
हम भी तो लेते नाम तुम्हारा,
हमको क्यों नहीं देते हो,
शाम सवेरे माला फेरे,
फिर कोई आराम नहीं,
हे नारायण मुझे बता दो,
निर्धन क्या इंसान नहीं।
किसी के पास में हीरा मोती,
किसी की फट रही धोती है,
कोई तो खावे दूध मलाई,
किसी को सूखी रोटी है,
कोई तो सोता टूटी झोपड़िया,
चारपाई में बांन नहीं,
हे नारायण मुझे बता दो,
निर्धन क्या इंसान नहीं।
तुम्हारी भक्ति करने से,
बेहतरनी भी तर जाते हैं,
सहारा कोई दे ना सके तो,
डूब भवर में जाते हैं,
हम गरीब को जहां पहुंचा दो,
सुखी रहे कोई दुखी नहीं,
नारायण हमें बता दो,
निर्धन क्या इंसान नहीं।
सत्य धर्म उठ गया यहां से,
झूठों को भरमाया है,
जिसके हाथ में होती लाठी,
वही भैंस ले जाता है,
प्रेमचंद कहे इसी भजन में,
बिना भजन उद्धार नहीं,
हे नारायण हमें बता दो,
निर्धन क्या इंसान नहीं।
धनवानो का मान जगत में,
निर्धन का सम्मान नहीं,
हे नारायण मुझे बता दो,
निर्धन क्या इंसान नहीं।
HEY NARYAN HUME BATA DO NIRDHAN KYA INSAAN NAI
Singer : SHRI DEVKINANDAN THAKUR JI MAHARAJ
धरती पर धन की चमक इतनी तेज़ है कि गरीब की सादगी छिप जाती है। अमीर को लोग सिर झुकाकर सलाम करते हैं, उसकी बात को तवज्जो देते हैं, जबकि निर्धन के पास जो कुछ भी है – मेहनत, ईमानदारी, दिल की सच्चाई – वो सब अनदेखा रह जाता है। शाम-सवेरे माला फेरते हैं, नाम जपते हैं, फिर भी रोटी सूखी रहती है, झोपड़ी टूटी रहती है, और चारपाई तक का सहारा नहीं मिलता। एक तरफ़ दूध-मलाई की मिठास, दूसरी तरफ़ भूख की जलन। दिल पूछता है – क्या सिर्फ़ जेब भारी होने से इंसान बन जाता है? क्या गरीब का दर्द, उसकी मेहनत, उसकी भक्ति कोई मायने नहीं रखती?
नारायण की लीला में सब बराबर हैं, पर दुनिया की नज़र में नहीं। भक्ति करने से बड़े-बड़े तर जाते हैं, किंतु गरीब के लिए सहारा कोई नहीं देता तो वो भंवर में डूबता चला जाता है। सत्य और धर्म कहीं पीछे छूट गए हैं, झूठ और लालच आगे बढ़ गए हैं। जिसके पास लाठी है, वही सब कुछ ले जाता है। प्रेमचंद की ये पुकार दिल को छू जाती है – बिना भजन के उद्धार नहीं होता, पर भजन करने वाले गरीब को भी क्या मिलता है? बस एक ही सवाल बाकी रह जाता है कि हे नारायण, निर्धन क्या इंसान नहीं? क्या उसकी आत्मा, उसका दर्द, उसकी उम्मीद कोई मूल्य नहीं रखती?
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