हमके गोकुल व बरसाना ब्रज चाही भजन

हमके गोकुल व बरसाना ब्रज चाही भजन

हमके गोकुल व,
बरसाना ब्रज चाही,
जउने भुइयाँ में,
लोटेन उस रज चाही,
हमके दयालु दया,
बस तोहार चाही,
मन में सत्संग कीर्तन,
और प्यार चाही।

जब चरण ग्राह,
धई के पछारे रहा,
कृष्ण गोविन्द कही के,
कहि गज पुकारे रहा,
सारी ताकत लगा हो,
बिबस हारे रहा,
त्यागि सबके जब,
तोहरे सहारे रहा,
नाथ गजराज,
वाली समझ चाही।

जो प्रभो नारि,
गौतम को तारे रहा,
सुर नर मुनि नाग,
किन्नर को प्यारे रहा,
राजा मिथिला की,
बगिया पधारे रहा,
जे के मलि मलि के,
केवट पखारे रहा,
उहीं कोमल चरणवा,
क रज चाही।

जेहि के कृपा कोर से,
भव की फांसी छूटई,
जेहिं के बल तन तजे,
प्राण कशी छुटई,
भक्त जन की है,
चिंता उदासी छूटई,
राम इस दाद की,
भव फांसी छूटई,
ऐसी अर्जी अदालत,
और जज चाही।

हमके गोकुल बरसाना ब्रज चाही | Hamke Gokul Barsana Braj Chahi | New Bhojpuri Krishna Bhajan , Best Devotional Songs
Singer - Dinesh Mishra
Music Prem Kumar

दिल में बस एक ही चाहत रह गई है, गोकुल और बरसाना की वो माटी, ब्रज की वो धूल, जिसमें लोटने की तड़प है। वो पवित्र भूमि जहां हर कण प्रेम से भरा है, बस उसी की रज चाहिए, क्योंकि वो रज ही जीवन देती है। दयालु की दया चाहिए, मन में सत्संग और कीर्तन का आलम, और सबसे ऊपर वो प्यार जो सब कुछ भुला दे। जब चरणों को पकड़ लिया, गज की तरह पुकार उठी, सारी ताकत लगा दी, लेकिन हार मानकर सब कुछ छोड़ दिया, तो सहारा मिला। नाथ ने समझ लिया, गजराज वाली वो भक्ति जो सब कुछ त्याग देती है।


जो प्रभु ने गौतम की नारी को तारा, सुर-नर-मुनि-नाग सबको प्यारा, राजा मिथिला के बाग में पधारा, और केवट के हाथों से चरण धुलवाए, वो कोमल चरणों की रज चाहिए। उनकी कृपा से भव की फांसी टूट जाती है, तन-प्राण छूटते हैं, चिंता-उदासी मिट जाती है। राम की दया से ये दास की भव-फांसी छूटती है, ऐसी अर्जी के लिए वो अदालत और जज चाहिए। ईश्वर का आशीर्वाद ऐसे ही प्रकट होता है, जब दिल से सब कुछ छोड़कर सिर्फ उनका सहारा मांग लिया जाता है। 

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