हाका मार के बुलावे तेरी धी के सथे आजा शेरावालिए भजन

हाका मार के बुलावे तेरी धी के सथे आजा शेरावालिए भजन


हाका मार के बुलावे तेरी धी,
के सथे आजा शेरावालिए
तेरे वाजों मेरा लगदा न जी,
ऐथे आजा शेरावालिए।।

जिन्दगी दा दुःख तियां मन च छुपांदियां,
दुःख-सुख लैके फेर मावां कोल आंदियां,
कोल बैठ माए,
जाणा तेरा की।।
ऐथे आजा...

तेरे वाजों मेरा लगदा न जी,
ऐथे आजा शेरावालिए।।

सोण दा महीना तेरा जागा लेया रख मां,
पल्ले मेरे तेला है नईं, लोका कोल लख मां,
मेरे लिखे मुकद्दरां च,
की ऐथे आजा।।
मेरा तेरे वाजों...

दस मैनूं फेर कदो खोलेंगी नसीबां नूं,
जागे विच आके अज तार दे गरीबां नूं,
सानूं फिकरां तों,
कर दे परी।।
के ऐथे आजा...
मेरा तेरे वाजों लगदा...

दुःख वाली पंड मेरे सिर तों उतार दे,
जागे विच आके मेरे कारज संवार दे,
मां गोदी च बिठाके मैनूं मावां वाला प्यार दे,
पांदी रवांगी मैं ज्योतां विच घी।।
के ऐथे आजा...
मेरा तेरे वाजों...

हाका मार के बुलावे तेरी धी,
के सथे आजा शेरावालिए।।


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हाके मारकर बुलाने की वह पुकार सच्ची तड़प और चाहत का संकेत है; यह अनुरोध दिल से निकले किसी अभाव को भरने के लिए है। सामने वाले के साथ होने की चाहत इतनी प्रबल है कि पास आने पर ही अकेलेपन और व्यथा का बोझ हल्का हो जाता है। साथ होने का एहसास अकेलेपन को मिटा कर जीवन में गतिशीलता, सुरक्षा और आत्मीयता भर देता है।

जिन्दगी के दुःख भीतर ही छुपा लिए जा चुके हैं; उन घड़ी‑घड़ी की पीड़ाओं को छिपाकर रखा गया है ताकि बाहर दिखावा बना रहे। पर लौट आने पर वही व्यक्ति सुख‑दुःख लेकर माँ की गोद जैसा आश्रय खोजता है — वहाँ पनाह और बिना शर्त प्यार मिलता है जो समझदार, शांत और मरहम लगाने वाला होता है। मातृत्व जैसी छाया में बैठना, अपना मन खोल देना और बच्चे जैसी निर्भरता जगा लेना, मानो सारी थकन और बोझ उतर जाएँ।
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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