माँ गंगा के पावन तट पर जो गया भजन

माँ गंगा के पावन तट पर जो गया भजन


माँ गंगा के पावन तट पर जो गया,
उसका जीवन जग में निर्मल हो गया।
तट पे गया, तट पे गया,
तट पे गया मेरी माँ।
माँ गंगा के पावन तट पे जो गया,
उसका जीवन जग में निर्मल हो गया॥

शिवशंकर के शीश पे,
उद्गम गौमुख धाम है।
भागीरथ के कर्म से,
सफल हुआ ये काम है।
राजा सगर सुत साठ हजार,
तूने किया उनका उद्धार।
उद्धार किया, उन्हें तार दिया,
भव पार किया मेरी माँ।
माँ गंगा के पावन तट पे जो गया,
उसका जीवन जग में निर्मल हो गया॥

पतितोद्धारिणी भगवती,
शंकर मौलिविहारिणी।
देवी सुरेश्वरी भगवती,
गंगे त्रिभुवन तारिणी।
जल महिमा भव रोग हरे,
पाप कटे, सब ताप हरे।
भयहारिणी भवतारिणी,
सुखदायिनी मेरी माँ।
माँ गंगा के पावन तट पे जो गया,
उसका जीवन जग में निर्मल हो गया॥

माँ गंगा के पावन तट पर जो गया,
उसका जीवन जग में निर्मल हो गया।
तट पे गया, तट पे गया,
तट पे गया मेरी माँ।
माँ गंगा के पावन तट पे जो गया,
उसका जीवन जग में निर्मल हो गया॥


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Vocal- Vidyakant Jha
Lyrics - Pt. Shivakant Jha
Banjo - Shivachandra Jee
Octapad - Akhilesh Jee
Dholak - Gautam Jee
Tabla - Ashutosh Jee
Recording - AR Studio Vidyapatinagar 
Recordist- Akshay Prakash 
 
तेरे जटाओं से बह निकला वह अमृत जब भी छुए मन की सूनी तहें, तो भीतरी अँधेरा फूल-सा खिल उठता है; जटा खुलते ही जन्मी गंगाजी की लहरों में पापों की राख धोकर निर्मलता का उजियार उतर आता है। शिव की शरण से पिघलकर आई वह धारा पतितन की उम्मीद बन जाती है—जिसने भी तिनका सा विश्वास से डुबकी लगाई, उसका जीवन अचानक हल्का और मुक्त नज़र आया। भागीरथ के तप का फल जो धरती पर उतरा, वह केवल पानी नहीं, एक नई साँस है जो क्षय और क्लेश को परास्त कर देती है; हर बार वह प्रवाह छूता है तो भय घटता और करुणा की हल्की छाया दिल पर पलने लगती है। दशमी की उस पुण्य बेला में जब गंगा अमृत बनकर आई, तो विरह-भीतर के सारे घाव सहलाए गए; एक डुबकी ने ही अनगिनत जीवनों को तट पर खड़ा कर दिया—वह तट जहाँ पाप कटते हैं, दुःख थमते हैं और आत्मा फिर से मुक्त होकर चल पड़ती है। 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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