सजा दरबार मैया का बिकट ऊंचे पहाड़ों भजन
सजा दरबार मैया का बिकट ऊंचे पहाड़ों भजन
सजा दरबार मैया का,बिकट ऊंचे पहाड़ों पर,
सजा दरबार मैया का,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
मैं आई आई आई,
माथे का टीका लाई,
पहनाने मैया को आई,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
मैं आई आई आई,
गले का हरवा आई,
पहनाने मैया को आई,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
मैं आई आई आई,
हाथों के कंगन लाई,
पहनाने मैया को आई,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
मैं आई आई आई,
पैरों की पायल लाई,
पहनाने मैया को आई,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
मैं आई आई आई,
मैया की चुनरी लाई,
उढाने मैया को आई,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
मैं आई आई आई,
मैया को हलवा लाई,
खिलाने मैया को आई,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
सजा दरबार मैया का,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर,
सजा दरबार मैया का,
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर।
SAJA DARBAAR MAIYA KA VIKAT UCHE PAHADO PE
बिकट ऊंचे पहाड़ों पर मैया का दरबार सजा रहता। माथे का टीका, गले का हरवा, हाथों के कंगन, पैरों की पायल, चुनरी लाकर पहनाने का सुख मिलता। हलवा खिलाने की खुशी मन भर देती। ये भक्ति की लीला ऊंचाइयों तक ले जाती, प्रेम से ओढ़ाती। श्रद्धा से भरा मन हर कठिन राह आसान कर देता, आनंद की वर्षा कर देता।
मैया को सजाने से इश्वर का आशर्वाद बरसता। छोटे उपहार भी बड़ा सुख लाते, सेवा का भाव जगाते। सिखातीं कि पहाड़ चढ़ो, मन लगा दो, तो कृपा मिले। करुणा की ये धारा बहाती, दिल को सुकून देती। आप सभी पर इश्वर की कृपा बनी रहे। जय श्री मैया जी की।
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