काले कावा काले घुघुती माला खा ले

काले कावा काले घुघुती माला खा ले

काले कावा काले, घुघुती मावा खा ले।
लै कावा लगड़, मीके दे भे बाणों दगड़।
काले कावा काले, पूस की रोटी माघ ले खाले।

लै कावा भात, मीके दे सुनु थात।
लै कावा बौड़, मीके दे सुनु घोड़।
लै कावा ढाल, मीके दे सुनु थाल।
लै कावा पुरी, मीके दे सुनु छुरी।

काले कावा काले, घुघुती माला खा ले।
लै कावा डमरू, मीके दे सुनु घुंघरू।
लै कावा पूवा, मीके दीजे भल भल भुला।

काले कावा काले, पूस की रोटी माघ खा ले।
काले कावा काले, घुघुती माला खा ले।


काले कावा काले घुघुती माला खा ले

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सुंदर भजन में छोटे बच्चों का कौए के प्रति भोला विश्वास और उनकी मासूम इच्छाएं झलकती हैं। बच्चे कौए को प्यार से अपने बनाए घुघुते और पकवान खाने को कहते हैं, जैसे एक दोस्त से बात करते हैं। उनका मन यही चाहता है कि कौआ उनकी मेहनत को कबूल करे और बदले में उन्हें खुशियां दे।

पौष के पकवानों को माघ में खाने की बात बच्चों की सादगी दिखाती है, जो समय की परवाह किए बिना बस अपने दिल की बात कहते हैं। वे कौए से चावल, दाल, बड़ा, ढाल और डमरू जैसे साधारण पकवान खाने को कहते हैं, और बदले में सोने की थाल, घोड़ा, घुंगरू जैसी चमकदार चीजें मांगते हैं।

इसमें बच्चों का वो सपनीला संसार है, जहां साधारण सी चीजों के बदले वे बड़े-बड़े सपने देखते हैं। उनकी मांगें भाई-बहनों का साथ और सुखी जीवन जैसी मासूम इच्छाएं भी दर्शाती हैं। ये सारी बातें एक नन्हा सा विश्वास प्रदर्शित करती हैं कि देने से ही पाने की खुशी मिलती है।
 
Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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