जहिया से चली गइले छोड़ अयोध्या

जहिया से चली गइले छोड़ अयोध्या


जहिया से चली गइले
छोड़ अयोध्या
नगर भइल सुनसान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो

वनवा में ऊ कैसे रहत होइहें
कुश के चटैया पर सोवत होइहें
कैसे सोवत होइहें सीता महारानी
सोच सोच बानी परेशान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो

माई के दुलार बिना कैसे ऊ रहीहें
भैया भरत के ऊ कैसे समझाइहें
मड़ई में रहत होइहें छोड़ि के महलवा
जिंदगी भइल वीरान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो

जहिया से चली गइले
छोड़ अयोध्या
नगर भइल सुनसान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो


Jahiya se chal gaile chhod ke ayodhya

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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