जहिया से चली गइले छोड़ अयोध्या

जहिया से चली गइले छोड़ अयोध्या


जहिया से चली गइले
छोड़ अयोध्या
नगर भइल सुनसान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो

वनवा में ऊ कैसे रहत होइहें
कुश के चटैया पर सोवत होइहें
कैसे सोवत होइहें सीता महारानी
सोच सोच बानी परेशान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो

माई के दुलार बिना कैसे ऊ रहीहें
भैया भरत के ऊ कैसे समझाइहें
मड़ई में रहत होइहें छोड़ि के महलवा
जिंदगी भइल वीरान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो

जहिया से चली गइले
छोड़ अयोध्या
नगर भइल सुनसान हो
जा ऐ विधना ऐ का भइल
वन चले गइले सियाराम हो


Jahiya se chal gaile chhod ke ayodhya

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सुन्दर भजन में वह करुण दृश्य सामने आता है जब श्रीरामजी वनगमन के लिए अयोध्या से विदा लेते हैं। जिस नगरी में हर ओर उत्सव और रौनक रहती थी, वही नगर उनके बिना सुनसान और वीरान प्रतीत होता है। राजमहलों की शोभा फीकी पड़ जाती है, गलियों का जीवन थम-सा जाता है और प्रजा का हृदय विरह में डूब जाता है।

वन में श्रीरामजी का जीवन कितना कठोर रहा होगा, इसका विचार भर मन को व्यथित कर देता है। कुश की चटाई पर विश्राम और तपस्वियों सा जीवन, यह सोचना ही कठिन है कि राजमहल की रानी सीताजी उस कठिनाई में कैसे साथ निभाती होंगी। यही चिंतन हर भक्त के हृदय को विचलित कर देता है।

माँ कौशल्या का स्नेह, पिता की छत्रछाया और भरत का भाईचारा—इन सबको छोड़कर श्रीरामजी ने केवल धर्मपालन के लिए वनवास स्वीकार किया। महलों की ऐश्वर्यपूर्ण सुख-सुविधाओं को त्यागकर उन्होंने झोपड़ी का जीवन जिया, यह त्याग केवल आदर्श ही नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा है।
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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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