सोहम बालो हालरो हारे निरमळ थारी जोत भजन

सोहम बालो हालरो हारे निरमळ थारी जोत भजन


सोहम बालो हालरो,
हारे निरमल थारी जोत।

नदी सुक्ता के घाट पर,
बैठे ध्यान लगाई,
आवत देखियो पींजरो,
हारे लियो कंठ लगाई,
सोहम बालो हालरो।

सप्त धातु को पींजरो,
हारे पाठ्या तिन सौ साठ,
एक एक कड़ी हो जड़ाँव,
कीवा पर कवि रचियो ठाट,
सोहम बालो हालरो।

आकाश झुलो बाँधियाँ,
हारे लाग्या त्रिगुण डोर,
जुगत सी झलणो झुलावजो,
हारे झुले मनरंग मोर,
सोहम बालो हालरो।

नही रे बाला तू सुतो जागतो,
बिन ब्याही को पुत,
सदाशिव की शरण म आयो हारे,
झल बाँझ को पुत,
सोहम बालो हालरो।

अणहद घुँघरु बाजियाँ,
अजपा का मेवँ,
अष्ट कमल दल खिली रयाँ,
हारे जैसे सरवर मेवँ,
सोहम बालो हालरो।

सोहम बालो हालरो,
हारे निरमल थारी जोत।



सोहम बालों हालरों नित निर्मलो // गायक प्रमोद भाई पटेल // T-Series Singaji Bhajans

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साधक नदी सुक्ता के घाट पर ध्यानमग्न बैठा है जब सप्त धातु का सुंदर पींजरा आकाश में आता दिखता है, उसे कंठ में धारण कर लेता है। त्रिगुण के डोर से बंधा आकाश झूला झूलता हुआ मनरंग मोर को आनंद देता है, अनहद घुँघरू बजते हैं और अष्टकमल खिल उठते हैं। बिन ब्याही बाला सदाशिव की शरण में आकर बाँझ को पुत्र का सुख पाती है, यह दृश्य निरमल ज्योति का प्रतीक बन जाता है।

सोहम का साधक परम सत्य के दर्शन पाता है, जहाँ बाहरी रूप भले बदलें पर भीतरी प्रकाश ही सबका आधार है। पींजरा और झूला योग की सिद्धियों के प्रतीक हैं, जो मन को लीन कर ईश्वर से जोड़ते हैं। यह भक्ति का उच्च भाव है जो निद्रा–जागरण से परे उठकर अनंत आनंद की अनुभूति कराता है। 
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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