गली तो चारों बंद हुई मीरा बाई भजन
गली तो चारों बंद हुई मीरा बाई भजन
बानी संत मीराबाई जी:-
गली तो चारों बंद हुई, मैं हरि से मिलूँ कैसे जाय ॥
ऊँची नीची राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय ।
सोच-सोच पग धरूँ जतन से, बार-बार डिग जाय ॥
ऊँचा नीचा महल पिया का, म्हाँ सूँ चढ़यो न जाय ।
पिया दूर पंथ म्हाँरो झीणो, सुरत झकोला खाय ॥
कोस-कोस पर पहरा बैठया, पैंड-पैंड बट मार ।
या विधना कैसी रच दीनी, दूर बसायो म्हाँरो गाँव ॥
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सतगुरु दई बताय ।
जुगन-जुगन से बिछड़ी मीराँ, घर में लीनी लाय ॥
गली तो चारों बंद हुई, मैं हरि से मिलूँ कैसे जाय ॥
ऊँची नीची राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय ।
सोच-सोच पग धरूँ जतन से, बार-बार डिग जाय ॥
ऊँचा नीचा महल पिया का, म्हाँ सूँ चढ़यो न जाय ।
पिया दूर पंथ म्हाँरो झीणो, सुरत झकोला खाय ॥
कोस-कोस पर पहरा बैठया, पैंड-पैंड बट मार ।
या विधना कैसी रच दीनी, दूर बसायो म्हाँरो गाँव ॥
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सतगुरु दई बताय ।
जुगन-जुगन से बिछड़ी मीराँ, घर में लीनी लाय ॥
Gali To Charon Band Hui || Bani Sant Mirabai Ji || Niranjan Saar ||
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मीराबाई का हृदय हरि के मिलन की तड़प से भरा है, पर राहें कठिन और रपटीली। चारों ओर बाधाएँ, मन डगमगाता है, पग-पग पर सोचकर कदम रखे, फिर भी ठोकर लगे। प्रिय का महल ऊँचा, चढ़ना दुष्कर, दूर का पंथ और मन की सुरत झकोले खाए। हर कदम पर पहरा, हर पग पर मार, जैसे विधना ने गाँव को दूर बसाकर बिछा दिया। पर सतगुरु की कृपा से मार्ग मिला, जो युगों की बिछड़ी आत्मा को हरि के घर ले आया। यह मीरा की भक्ति है, जहाँ प्रेम और समर्पण हर बाधा को पार कर, गिरधर नागर के चरणों में साधक को लीन कर देता है।
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Author - Saroj Jangir
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