गुरुजी कब आवांगे मोरे देश भजन
गुरुजी कब आवांगे मोरे देश भजन
मीरा देखण बाट खड़ी
दासी देखण बाट खड़ी
आवण आवण कह गए सदगुरु
कर गए कमली अणेक
गिणते गिणते घिस गई
मोरी उंगली की आरेखा
सतगुरू जी को ढूँढण चाली
करके भगवा भेष
ढूंढत ढूंढत उमर बीत गई
हो गई केस सफेद
कागज़ नाही स्याही नाही
नहीं लेख उस देश
पंछी को प्रवेश नहीं जी
कैसे भेजूंगी संदेश
काशी ढूंढी मथुरा ढूंढा
ढूंढा देश विदेश
मीरा को गुरु रविदास मिले
सतनाम गुरु भेष
GURUJI KAB AAOGE
मीरा के हृदय की यह पुकार गुरु रविदास के लिए एक ऐसी तड़प है, जो किसी प्यासे की वर्षा के लिए व्याकुलता सी है। वह दासी की तरह राह ताकती है, मानो कोई दीपक हवा में भी अपनी लौ थामे रखे। गुरु का वचन कि वे आएँगे, मन को बाँधे रखता है, पर प्रतीक्षा इतनी लंबी है कि उंगलियों की रेखाएँ तक गिनते-गिनते मिट गईं। यह केवल समय का इंतज़ार नहीं, बल्कि उस सत्य की खोज है, जो आत्मा को जागृत करे।
भगवा वस्त्र पहन, संसार त्यागकर, मीरा गुरु की तलाश में निकली, जैसे कोई नदी सागर की ओर बहे। उम्र बीती, केश सफेद हुए, पर वह खोज नहीं रुकी। सांसारिक साधन—कागज, स्याही—उस अनंत देश तक नहीं पहुँचते, जहाँ सत्य का प्रकाश है। काशी, मथुरा, देश-विदेश छान मारे, पर सत्य बाहर नहीं, हृदय में बसता है।
प्रेम और समर्पण ही वह मार्ग है, जो सत्य तक ले जाता है। मीरा को गुरु रविदास तब मिले, जब उनकी तड़प सतनाम का रंग बन गई। यह प्रेम ही है, जो गुरु के रूप में सत्य को हृदय में उजागर करता है, जैसे कोई तारा अंधेरे में रास्ता दिखाए।
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