आरती पंच परमेष्ठी जैन भजन

आरती पंच परमेष्ठी जैन भजन

इह-विधि मंगल आरति कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै | टेक
पहली आरति श्रीजिनराजा, भव-दधि पार उतार जिहाजा | इह0
दूसरी आरति सिद्धन केरी, सुमिरन करत मिटै भव फेरी | इह0
तीजी आरति सूर मुनिंदा, जनम-मरन दुख दूर करिंदा | इह0
चौथी आरति श्रीउवझाया, दर्शन देखत पाप पलाया | इह0
पांचमी आरति साधु तिहांरी, कुमति-विनाशन शिवअधिकारी | इह0
छट्ठी ग्यारह प्रतिमा धारी, श्रावक वन्दौं आनंदकारी | इह0
सातमि आरति श्रीजिनवानी, ; ‘द्यानत’ सुरग-मुकति सुखदानी | इह0
 

आरती पंच परमेष्ठी | Aarti Panchparmeshthi | Jain Devotional Song 2017 |Mahavira Plus

सुन्दर भजन में पंच परमेष्ठियों के प्रति गहरी श्रद्धा और उनके द्वारा प्रदान की गई मुक्ति की अनुभूति समाई हुई है। जीवन के समुद्र में डूबते हुए जीव को जब इन दिव्य शक्तियों की शरण मिलती है, तब वह संसार के दुखों और मोह-माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है। श्रीजिनराजा की आरती से आरंभ होकर, जो भवसागर को पार कराने वाले हैं, मन में आशा और विश्वास की ज्योति जलती है। उनके चरणों में समर्पण से मनुष्य को जीवन के कष्टों से छुटकारा मिलता है।

सिद्धों की आरती से यह समझ आता है कि उनकी स्मृति और ध्यान से संसार के फेर, यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। सूर मुनिंदा की आरती जीवन के दुखों को दूर करने का संकेत देती है, जो मनुष्य को आत्मा की शांति की ओर ले जाती है। श्रीउवझाया के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।

साधुओं की आरती में कुमति का विनाश और शिव की शक्ति का अनुभव होता है, जो मनुष्य को अज्ञानता और बुराई से मुक्त करता है। ग्यारह प्रतिमा धारियों की आरती में श्रावकों की भक्ति और आनंद की अनुभूति शामिल है, जो समाज में धर्म और नैतिकता के पालन का संदेश देती है। अंत में श्रीजिनवानी की आरती से ज्ञान और ध्यान की महत्ता उजागर होती है, जो स्वर्ग, मोक्ष और सुख का द्वार खोलती है।

जब मनुष्य इन परमेष्ठियों के प्रति श्रद्धा और समर्पण करता है, तब उसके मन की अशांति दूर होती है, और वह सत्य, ज्ञान तथा आनंद के मार्ग पर अग्रसर होता है। 

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