भरीऐ हथु पैरु तनु देह
भरीऐ हथु पैरु तनु देह
शब्द गुरू नानक देव जी
भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥
पाणी धोतै उतरसु खेह ॥
मूत पलीती कपड़ु होइ ॥
दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ ॥
भरीऐ मति पापा कै संगि ॥
ओहु धोपै नावै कै रंगि ॥
पुंनी पापी आखणु नाहि ॥
करि करि करणा लिखि लै जाहु ॥
आपे बीजि आपे ही खाहु ॥
नानक हुकमी आवहु जाहु
भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥
पाणी धोतै उतरसु खेह ॥
मूत पलीती कपड़ु होइ ॥
दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ ॥
भरीऐ मति पापा कै संगि ॥
ओहु धोपै नावै कै रंगि ॥
पुंनी पापी आखणु नाहि ॥
करि करि करणा लिखि लै जाहु ॥
आपे बीजि आपे ही खाहु ॥
नानक हुकमी आवहु जाहु
भरीऐ हथु पैरु तनु देह
Shabd Guroo Naanak Dev JeeBhareeai Hathu Pairu Tanu Deh .
Paanee Dhotai Utarasu Kheh .
Moot Paleetee Kapadu Hoi .
De Saaboonu Laeeai Ohu Dhoi .
Bhareeai Mati Paapa Kai Sangi .
Ohu Dhopai Naavai Kai Rangi .
Punnee Paapee Aakhanu Naahi .
Kari Kari Karana Likhi Lai Jaahu .
Aape Beeji Aape Hee Khaahu .
Naanak Hukamee Aavahu Jaahu
Paanee Dhotai Utarasu Kheh .
Moot Paleetee Kapadu Hoi .
De Saaboonu Laeeai Ohu Dhoi .
Bhareeai Mati Paapa Kai Sangi .
Ohu Dhopai Naavai Kai Rangi .
Punnee Paapee Aakhanu Naahi .
Kari Kari Karana Likhi Lai Jaahu .
Aape Beeji Aape Hee Khaahu .
Naanak Hukamee Aavahu Jaahu
श्री गुरु नानक देव जी साखी - कलयुग से वार्तालाप
जीवन का सत्य इस तरह प्रकट होता है कि बाहरी शुद्धता और आंतरिक पवित्रता दोनों ही आवश्यक हैं। जैसे हाथ-पैर और शरीर को पानी से धोने से धूल हटती है, वैसे ही मन को पापों के संग से मुक्त करने के लिए प्रभु के नाम का रंग चाहिए। कपड़े की मैल साबुन से धुलती है, लेकिन मन की मैल केवल सत्संग और सच्चाई के प्रकाश से साफ होती है। यह समझ जरूरी है कि कोई पुण्य या पापी जन्म से नहीं बनता; कर्म ही वह बीज है, जो बोया जाता है और उसका फल भोगा जाता है।
जीवन एक यात्रा है, जहां हर कदम पर किए गए कार्यों का लेखा स्वयं को ही देना पड़ता है। जैसे किसान अपने बोए बीजों का फल पाता है, वैसे ही मनुष्य अपने कर्मों का परिणाम भोगता है। इस संसार में आना-जाना विधान के अधीन है, परंतु इस यात्रा में मन को निर्मल रखने का दायित्व स्वयं का है। सच्चा मार्ग वही है, जो प्रभु के नाम और सत्य के साथ एकरूप होकर जीवन को शुद्ध और अर्थपूर्ण बनाता है।
जीवन एक यात्रा है, जहां हर कदम पर किए गए कार्यों का लेखा स्वयं को ही देना पड़ता है। जैसे किसान अपने बोए बीजों का फल पाता है, वैसे ही मनुष्य अपने कर्मों का परिणाम भोगता है। इस संसार में आना-जाना विधान के अधीन है, परंतु इस यात्रा में मन को निर्मल रखने का दायित्व स्वयं का है। सच्चा मार्ग वही है, जो प्रभु के नाम और सत्य के साथ एकरूप होकर जीवन को शुद्ध और अर्थपूर्ण बनाता है।
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Author - Saroj Jangir
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