गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो भजन

गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो भजन

गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
जैसे मंदिर दीपक बिना सूना,
नही वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।


जब तक कन्या रहे कुंवारी,
नही पति का बेरा,
आठ पहर वो रहे आलस मे,
खेले खेल घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।

मिरगा की नाभी मे बसे किस्तुरी,
नही मिर्ग न बेरा,
गाफिल होकर फिरे जंगल मे,
सुंघे घास घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।

पथर माही अग्नी व्यापे,
नही पथर ने बेरा,
चकमक चोट लगे गुरू गम की, आग फिरे चोफेरा,
मिरगा की नाभी मे बसे किस्तुरी,
नही मिर्ग न बेरा,
गाफिल होकर फिरे जंगल मे,
सुंघे घास घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।

मोजीदास मिल्या गुरू पुरा,
जाग्या भाग भलेरा,
कहे मनरूप शरण सत्गुरु की,
गुरु चरना चित मेरा,
मिरगा की नाभी मे बसे किस्तुरी,
नही मिर्ग न बेरा,
गाफिल होकर फिरे जंगल मे,
सुंघे घास घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।

गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
जैसे मंदिर दीपक बिना सूना,
नही वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।

"गुरु" के बारे में कबीर की विचार धारा : कबीर साहब ने गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहा है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए गुरु का सानिध्य आवश्यक है गुरु ही शिष्य की आंखें खोलता है गुरु ही शिष्य को ज्ञान देता है और गुरु की महिमा अपरंपार है अनंत है सही मायने में गुरु ही वह शख्स है जो अपने शिष्य को सत्य के मार्ग की ओरअग्रसर करता है तथा उसे पाखंड और कर्मकांड से बचाता है

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत-दिखावनहार।।
 
गुरु और शिष्य का संबंध आपस में प्रगाढ़ हैं तो यह आवश्यक नहीं कि गुरु और शिष्य पास पास में ही रहे. वह दूर रहकर के भी पास में रह सकते हैं गुरु चाहे भले ही बनारस में रहे वह सदैव एक दूसरे के साथ ही रहते हैं

गुरु जो बसै बनारसी, सीष समुंदर तीर।
एक पलक बिसरै नहीं, जो गुण होय सरीर।

गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो राजस्थानी भजन रामस्वरुप भोपा

Guru Bina Ghor Andhera Re Santo,
Jaise Mandir Deepak Bina Soona,
Nahee Vastu Ka Bera,
Guru Bina Ghor Andhera Re Santo..

Singer-Ramswaroop Das,
Tabla-Firoz Bhiyani,
From collection of Gokul Manch.
 
आग लगी आसमान में,
झुर झुर गिरे अँगार,
संत  ना होते जगत में,
तो जल जातो संसार।
(आग लगी आकाश में, झर झर पड़त अंगार,
संत न होते जगत में तो जल मरता संसार )
सो सो चंदा उगवे,
सूरज तपे हज़ार,
इतरो चानणो होवता,
गुरु बिन घोर अंधार।
गुरु बिन घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिन घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदरियों सूनों,
अब नहीं वस्तु का बेरा जी,
(गुरु बिन घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिन घोर अँधेरा जी,
बिना दिपक मंदरियो सुनों,
अब नहीं वस्तु का बेरा जी )

अरे जब तक कन्या रहवे कँवारी,
नहीं पुरुष का बेरा जी,
आठों पहर आळस माहीं खेले,
अब खेले खेल घनेरा जी,
(गुरु बिन घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिन घोर अँधेरा जी,
बिना दिपक मंदरियो सुनों,
अब नहीं वस्तु का बेरा जी )

अरे मिरगे री नाभि बसे कस्तूरी,
नहीं मिरगे को बेरा जी,
रणीबनी में फिरे भटकतो,
अब सूंघे घास घनेरा जी,
(गुरु बिन घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिन घोर अँधेरा जी,
बिना दिपक मंदरियो सुनों,
अब नहीं वस्तु का बेरा जी )

अरे जब तब आग रहवे पत्थर में,
नहीं पत्थर को बेरा जी,
चकमक चोटां लागै  शबद री,
अब फेके आग चंपेरा जी,
(गुरु बिन घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिन घोर अँधेरा जी,
बिना दिपक मंदरियो सुनों,
अब नहीं वस्तु का बेरा जी )

रामानंद मिल्या गुरु पूरा,
दिया सबद टकसाणा जी,
कहत कबीर सुणों भई संतो,
अब मिट गया भरम अँधेरा जी,
(गुरु बिन घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिन घोर अँधेरा जी,
बिना दिपक मंदरियो सुनों,
अब नहीं वस्तु का बेरा जी )


 Prakash Mali Live Bhajan: Guru Bin Ghor Andhar | Rajasthani Popular Bhajan | RDC Rajasthani 2021
 
गुरु देवन के देव हो,
ने आप बड़े जगदीश,
 बेडी भवजल बीच में,
गुरु थारो विशवास।
सो सो चंदा उगवे,
सूरज तपे हजार,
इतरो चानणो होवता,
गुरु बिन घोर अंधार।
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिना घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदिर सूनों,
नहीं वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।

जब तक कन्या रहे कुँवारी,
नहीं पुरुष का बेरा जी,
आठों पहर आळस माहीं खेले,
खेले खेल घणेरा
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिना घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदिर सुनों,
नहीं वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।

मिरगे री नाभ बसे कस्तूरी,
नहीं मिरगे को बेरा जी,
गाफिल होकर फिरे जंगल मे,
सूंघे घास घनेरा जी,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिना घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदिर सुनों,
नहीं वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।

जब तक आग रहवे पत्थर में,
नहीं पत्थर को बेरा जी,
चकमक चोटा लागे शब्द री,
फेंके आग चंपेरा जी,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिना घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदिर सुनों,
नहीं वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।

रामानंद मिल्या गुरू पूरा,
दिया शबद टकशाला,
कहत कबीर सुणों भई संतों,
अब मिट गया भरम अँधेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिना घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदिर सुनों,
नहीं वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।

गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
गुरु बिना घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदिर सुनों,
नहीं वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।
सो सो चंदा उगवे, सूरज तपे हजार : यदि सो सो चन्द्रमा भी उग आएं और सूरज भी पूर्ण रूप से तपने लगे (प्रकाशित हो उठे)
इतरो चानणो होवता, गुरु बिन घोर अंधार : इतना प्रकाश होने के बावज़ूद भी गुरु के बग़ैर अँधेरा ही होता है। 
इतरो-इतना, चानणों -प्रकाश, उजाला, अंधार -अँधेरा।
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो : गुरु (गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान प्रकाश) के अभाव में जीवन में अत्यंत ही अधेरा होता है. गुरु ज्ञान के अभाव में जीवात्मा अज्ञान के अँधेरे में ही पड़ी रहकर व्यर्थ ही जीवन को नष्ट करती है. अँधेरा अज्ञान का है जो गुरु के अभाव में व्याप्त रहता है।
गुरु बिना : बगैर गुरु के, घोर अँधेरा -अत्यंत ही गहन अँधेरा होता है. रे संतो- संतजन.
बिना दीपक मंदिर सूनों : उदाहरण के लिए जैसे मंदिर दीपक के बिना सूना होता है, शोभामान नहीं होता है.
नहीं वस्तु का बेरा : वस्तु से आशय तत्वज्ञान से है. गुरु के अभाव में जीवन का उद्देश्य विस्मृत होता है और जीवन गाफिल होता है.बेरा-ज्ञान।
जब तक कन्या रहे कुँवारी : जब तक कन्या का विवाह नहीं हो जाता है.
नहीं पुरुष का बेरा जी : उसे अपने स्वामी का बोध नहीं हो पाता है. भाव है की जैसे विवाह के उपरान्त ही स्वामी/पति के विषय में बोध होता है, ऐसे ही गुरु की प्राप्ति के उपरान्त ही व्यक्ति को जीवन के बारे में पता चल पाता है.
आठों पहर आळस माहीं खेले, खेले खेल घणेरा : वह आठों पहर, पुरे समय में आलस में रहती है और अनेकों खेल खेलती है. खेल से आशय है की वह गाफिल होकर व्यर्थ के काम करती है. खेल-मायाजनित क्रियाएं।
मिरगे री नाभ बसे कस्तूरी : मृग की नाभि में ही कस्तूरी होती है लेकिन वह इससे अबोध होती है.
नहीं मिरगे को बेरा जी : लेकिन मृग/हिरन को इस विषय में पता नहीं होता है . बेरा-पता होना.
गाफिल होकर फिरे जंगल मे, सुंघे घास घनेरा : कस्तूरी को ढूंढने के चक्कर में वह गाफिल होकर जंगल के सभी घास को सूंघती रहती है.
जब तक आग रहवे पत्थर में, नहीं पत्थर को बेरा जी : पत्थर में ही अग्नि होती है, लेकिन पत्थर को इसके बारे में पता नहीं होता है.
चकमक चोटा लागे शब्द री फेंके आग चंपेरा जी :  जब गुरुज्ञान रूपी चोट लगती है तभी प्रकाश पैदा होता है. ऐसे ही जीवात्मा को जब गुरु के ज्ञान की चोट लगती है तो वह प्रकाशित हो उठता है और अपने उद्देश्य को पहचानने लगता है। 
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Guru Bin Ghor Andhera | Rajasthani Live Bhajan | Prakash Mali Popular Bhajan
 
 
गुरु बिन घोर अँधेरा संतो ,गुरु बिन घोर अँधेरा जी,
बिना दीपक मंदरियो सुनो , अब नहीं वास्तु का वेरा हो जी,

जब तक कन्या रेवे कवारी, नहीं पुरुष का वेरा जी,
आठो पोहर आलस में खेले , अब खेले खेल घनेरा हो जी,

मिर्गे री नाभि बसे किस्तूरी , नहीं मिर्गे को वेरा जी,
रनी वनी में फिरे भटकतो , अब सूंघे घास घणेरा हो जी,

जब तक आग रेवे पत्थर में , नहीं पत्थर को वेरा जी,
चकमक छोटा लागे शबद री , अब फेके आग चोपेरा हो जी,

रामानंद मिलिया गुरु पूरा ,दिया शबद तत्सारा जी,
कहत कबीर सुनो भाई संतो , अब मिट गया भरम अँधेरा हो जी, 


Guru Bina Gor Andhera || Chotu Singh Rawna || Shri Ratnam Music || Rajasthani Bhajan ||

जैसे मंदिर दीपक बिना सूना,
नही वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।
जब तक कन्या रहे कुंवारी,
नही पति का बेरा,
आठ पहर वो रहे आलस मे,
खेले खेल घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।
मिरगा की नाभी मे बसे किस्तुरी,
नही मिर्ग न बेरा,
गाफिल होकर फिरे जंगल मे,
सुंघे घास घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।
पथर माही अग्नी व्यापे,
नही पथर ने बेरा,
चकमक चोट लगे गुरू गम की,
आग फिरे चोफेरा,
मिरगा की नाभी मे बसे किस्तुरी,
नही मिर्ग न बेरा,
गाफिल होकर फिरे जंगल मे,
सुंघे घास घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।
मोजीदास मिल्या गुरू पुरा,
जाग्या भाग भलेरा,
कहे मनरूप शरण सत्गुरु की,
गुरु चरना चित मेरा,
मिरगा की नाभी मे बसे किस्तुरी,
नही मिर्ग न बेरा,
गाफिल होकर फिरे जंगल मे,
सुंघे घास घनेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो,
जैसे मंदिर दीपक बिना सूना,
नही वस्तु का बेरा,
गुरु बिना घोर अँधेरा रे संतो।।
 
राजस्थानी शब्दों की प्रधानता वाले इस भजन का आशय है की मंदिर जैसे दीपक/दीप के अभाव में सूना होता है, ऐसे ही गुरु के बिना हृदय में / जीवन में अँधेरा होता है। उसे तत्व का बोध नहीं होता है। 
 
चेतावनी भजन : चेतावनी भजन का का मूल विषय व्यक्ति को उसके अवगुणों के बारे में सचेत करना और सत्य की राह पर अग्रसर करना होता है। राजस्थानी चेतावनी भजनो का मूल विषय यही है। गुरु की शरण में जाकर जीवन के उद्देश्य के प्रति व्यक्ति को सचेत करना ही इनका भाव है। चेतावनी भजनों में कबीर के भजनो को क्षेत्रीय भाषा में गया जाता है या इनका कुछ अंश काम में लिया जाता है। गुरु के ज्ञान के बिना जीवन में अँधेरा ही अँधेरा है क्योंकि जीवन का उद्देश्य विस्मृत होने लगता है, अतः गुरु के ज्ञान का बहुत अधिक महत्त्व होता है. जैसे मंदिर दीपक के बिना सूना होता है, ऐसे ही बिना गुरु ज्ञान के जीवन सुना होता है.
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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