साधु लडे रे शबद के ओटै नाथ जी भजन
साधु लडे रे शबद के ओटै भजन
साधु लडे रे शबद के ओटै,
तन पर चोट कोनी आयी मेरा भाई रे,
साधा करी है लड़ाई,
ओजी म्हारा गुरु ओजी॥
तन पर चोट कोनी आयी मेरा भाई रे,
साधा करी है लड़ाई,
ओजी म्हारा गुरु ओजी॥
ओजी गुरुजी, पाँच पच्चीस चल्या पाखारिया
आतम करी है चढ़ाई ।
आतम राज करे काया मे,
ऐसी ऐसी अदल जमाई ॥
ओजी गुरुजी, सात शबद का मँड्या है
मोरचा, गढ़ पर नाल झुकाई ।
ग्यान का गोला लग्या घट भीतर,
भरमाँ की बुरज उड़ाई ॥
ओजी गुरुजी, ज्ञान का तेगा लिया है हाथ मे,
करमा की कतल बनाई ।
कतल कराइ भरमगढ़ भेल्या,
फिर रही अलख दुहाई ॥
ओजी गुरुजी, नाथ गुलाब मिल्या गुरु पूरा,
लाला लगन लखाई ।
भानी नाथ शरण सतगुरु की,
खरी नौकरी पाई ॥
साधु लडे रे शबद के ओटैलिरिक्स Sadhu Lade Shabad Ke Oute Lyrics Rattinath Ji Bhajan
सतगुरु पुरा म्हाने मिल्या है सुमरतां, पियाजी री छतरी बताओ जी॥टेर॥
कहाँ सेती तुम चलकर आया रे, कुण थाने रस्ता बताया जी
कहाँ तेरा स्थान कहीजै रे, सो मोहे दरसाओ जी॥1॥
नाम नगर से चलकर आया रे, सतगुरु रस्ता बताया
भवसागरिये मे तीरना उपर, पकड़ भुजा सतगुरु ल्याया॥2॥
चढ़ छतरी पर मगन भया है रे, भँवर कुसाली पे आया
सात सखी रल मंगल गावै, जमड़ा देखत रोया॥3॥
नवलनाथ जोगी पुरा म्हाने मिलिया, रब का रस्ता बताया
भणत कमाल नवल थारे शरणे, बैठ तन्दूरे पे गाया॥4॥
ऐसी फकीरी म्हारे दिल विच हेरी रमता रावल देगा फेरी
आठ पहर म्हारे लहर भजन की रटता साँज सवेरी॥टेर॥
अमर बेल के अमर फर लाग्या गुरु के बाग मे गहरी।
पिचरगं फूल जांरी सोरम सीतरी नहीं डाल नहीं पेरी॥1॥
अडा अडा जोगी फकड़ दीवाना नहीं लालच नहीं लहरी।
जरणा की झोली तन की मोखली कफनी कुदरत पहरी॥2॥
गगन मंडल से बून्द उतरी ठीक पड़ी जद ठहरी।
गुरु बिन म्हारे घट अन्धेरा जाडी जाडी रैन अन्धेरी॥3॥
कुणसे नाम से होसी निस्तारा, काँई गत होजा जीव तेरी।
लियाडे नाम से होसी निस्तारा, हर ने भज्या गति न्यारी॥4॥
माली देवसिंह बाडी बाई सत संगता निपजाई।
दोव कर जोड़ बोला देव सिंह नेकी म्हारी रामजी निभाई॥5॥
सतगुरु पुरा म्हाने मिल्या है सुमरतां, पियाजी री छतरी बताओ जी॥टेर॥
कहाँ सेती तुम चलकर आया रे, कुण थाने रस्ता बताया जी
कहाँ तेरा स्थान कहीजै रे, सो मोहे दरसाओ जी॥1॥
नाम नगर से चलकर आया रे, सतगुरु रस्ता बताया
भवसागरिये मे तीरना उपर, पकड़ भुजा सतगुरु ल्याया॥2॥
चढ़ छतरी पर मगन भया है रे, भँवर कुसाली पे आया
सात सखी रल मंगल गावै, जमड़ा देखत रोया॥3॥
नवलनाथ जोगी पुरा म्हाने मिलिया, रब का रस्ता बताया
भणत कमाल नवल थारे शरणे, बैठ तन्दूरे पे गाया॥4॥
ऐसी फकीरी म्हारे दिल विच हेरी रमता रावल देगा फेरी
आठ पहर म्हारे लहर भजन की रटता साँज सवेरी॥टेर॥
अमर बेल के अमर फर लाग्या गुरु के बाग मे गहरी।
पिचरगं फूल जांरी सोरम सीतरी नहीं डाल नहीं पेरी॥1॥
अडा अडा जोगी फकड़ दीवाना नहीं लालच नहीं लहरी।
जरणा की झोली तन की मोखली कफनी कुदरत पहरी॥2॥
गगन मंडल से बून्द उतरी ठीक पड़ी जद ठहरी।
गुरु बिन म्हारे घट अन्धेरा जाडी जाडी रैन अन्धेरी॥3॥
कुणसे नाम से होसी निस्तारा, काँई गत होजा जीव तेरी।
लियाडे नाम से होसी निस्तारा, हर ने भज्या गति न्यारी॥4॥
माली देवसिंह बाडी बाई सत संगता निपजाई।
दोव कर जोड़ बोला देव सिंह नेकी म्हारी रामजी निभाई॥5॥
साधु की लड़ाई तलवारों की नहीं, शब्दों की है, जो मन के भीतर की माया को चीर देती है। यह युद्ध शरीर पर चोट नहीं लाता, बल्कि आत्मा को जागृत करता है। जैसे सूरज की किरणें कोहरे को भेद देती हैं, वैसे ही गुरु का ज्ञान अज्ञान के किले को ढहा देता है। यह विश्वास सिखाता है कि सच्ची जीत बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मा के राज में है।
गुरु की कृपा से ज्ञान का तेगा हाथ में आता है, जो कर्मों के बंधन और भ्रम की बुरज को नेस्तनाबूत कर देता है। सात शब्दों का मोर्चा, जैसे सात सुरों की माला, मन के गढ़ पर चढ़ाई करता है। यह चिंतन मन को यह शिक्षा देता है कि सत्य का सुमिरन और गुरु का साथ ही वह मार्ग है, जो भटकाव से मुक्ति दिलाता है।
सतगुरु की शरण में पाकर भक्त का मन लाला-सा खिल उठता है। यह शरण केवल आश्रय नहीं, बल्कि खरी नौकरी है, जो जीवन को अलख की दुहाई में रंग देती है। जैसे नदी सागर में मिलकर अपनी पहचान पाती है, वैसे ही गुरु के मार्ग पर चलकर भक्त सच्ची लगन और आत्मिक शांति को प्राप्त करता है।
गुरु की कृपा से ज्ञान का तेगा हाथ में आता है, जो कर्मों के बंधन और भ्रम की बुरज को नेस्तनाबूत कर देता है। सात शब्दों का मोर्चा, जैसे सात सुरों की माला, मन के गढ़ पर चढ़ाई करता है। यह चिंतन मन को यह शिक्षा देता है कि सत्य का सुमिरन और गुरु का साथ ही वह मार्ग है, जो भटकाव से मुक्ति दिलाता है।
सतगुरु की शरण में पाकर भक्त का मन लाला-सा खिल उठता है। यह शरण केवल आश्रय नहीं, बल्कि खरी नौकरी है, जो जीवन को अलख की दुहाई में रंग देती है। जैसे नदी सागर में मिलकर अपनी पहचान पाती है, वैसे ही गुरु के मार्ग पर चलकर भक्त सच्ची लगन और आत्मिक शांति को प्राप्त करता है।
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