मुनिसुव्रतनाथ आरती ऊँ जय मुनिसुव्रतस्वामी

मुनिसुव्रतनाथ आरती ऊँ जय मुनिसुव्रतस्वामी

ऊँ जय मुनिसुव्रतस्वामी, प्रभु जय मुनिसुव्रतस्वामी |
भक्ति भाव से प्रणमूं, जय अंतरयामी || ऊँ जय0
राजगृही में जन्म लिया प्रभु, आनन्द भयो भारी |
सुर नर-मुनि गुण गाएँ, आरती कर थारी || ऊँ जय0
पिता तिहारे, सुमित्र राजा, शामा के जाया |
श्यामवर्ण मूरत तेरी, पैठण में अतिशय दर्शाया ||ऊँ जय0
जो ध्यावे सुख& पावे, सब संकट दूर करें |
मन वांछित फल पावे, जो प्रभु चरण धरें || ऊँ जय0
जन्म मरण, दुख हरो प्रभु, सब पाप मिटे मेरे |
ऐसी कृपा करो प्रभु, हम दास रहें तेरे || ऊँ जय0
निजगुण ज्ञान का, दीपक ले आरती करुं थारी |
सम्यग्ज्ञान दो सबको, जय त्रिभुवन के स्वामी || ऊँ जय0

 Aarti MuniSuvratnath | आरती श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान | Aarti Shri MuniSuvratnath Bhagwan
सुंदर भजन में श्री मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के प्रति भक्ति और श्रद्धा का उद्गार गूंजता है। यह भाव उस भक्त के हृदय की पुकार है, जो प्रभु के चरणों में शरण मांगता है, जैसे पथिक रेगिस्तान में छांव की तलाश करता है। राजगृही में जन्मे मुनिसुव्रतनाथ, सुमित्र राजा और शामा माता के पुत्र, अपने श्यामवर्ण रूप और संयम के प्रतीक हैं, जिनके दर्शन से ही मन आनंद से भर जाता है। 

उनकी आरती करना सुर, नर और मुनियों का गुणगान है, जो उनके अतिशय गुणों को हृदय में बसाता है। जैसे दीया अंधेरे को मिटाता है, वैसे ही मुनिसुव्रतनाथ का स्मरण संकटों को दूर करता है और मन की हर इच्छा को पूर्ण करता है। उनकी भक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाती है, और पापों का नाश करती है। यह उद्गार मन को सिखाता है कि सच्चा सुख प्रभु की शरण में है, जहां आत्मा को शांति मिलती है। 

मुनिसुव्रतनाथ का ज्ञान वह दीपक है, जो अज्ञानता के अंधकार को मिटाता है। उनकी कृपा से सम्यक् ज्ञान प्राप्त होता है, जो जीवन को त्रिभुवन का स्वामी बनाता है। जैसे नदी सागर से मिलकर पूर्ण होती है, वैसे ही उनकी भक्ति भक्त को मोक्ष के मार्ग पर ले जाती है। यह भाव प्रेरित करता है कि प्रभु के चरणों में समर्पण ही जीवन का सच्चा धन है।
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