राणा जी अब न रहूंगी तोर हठ की भजन
राणा जी अब न रहूंगी तोर हठ की
राणा जी...हे राणा जी
राणा जी अब न रहूंगी तोर हठ की
साधु संग मोहे प्यारा लागे
लाज गई घूंघट की
हार सिंगार सभी ल्यो अपना
चूड़ी कर की पटकी
महल किला राणा मोहे न भाए
सारी रेसम पट की
राणा जी... हे राणा जी
जब न रहूंगी तोर हठ की
भई दीवानी मीरा डोले
केस लटा सब छिटकी
राणा जी... हे राणा जी!
अब न रहूंगी तोर हठ की।
(हटकी=रोकी हुई, साध=साधु, सुरत-निरत=स्मरण और नृत्य,सन्त-मत की प्रमुख साधना के दो अंग, मुकुर=शीशा, घट=हृदय, पट=कपड़ा)
राणा जी अब न रहूंगी तेरी हटकी (मीरा जी)