राणाजी थें जहर दियो म्हे जाणी मीराबाई भजन
राणाजी थें जहर दियो म्हे जाणी मीराबाई भजन
राणाजी थें जहर दियो म्हे जाणीराणाजी थें जहर दियो म्हे जाणी।।टेक।।
जैसे कञ्चन दहत अगनि से, निकसत बाराबाणी।
लोकलाज कुल काण जगत की, दृढ बहाय जस वाणी।
अपणे घर का परदा करले, में अबला बौराणी।
तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक ग्यो सनकाणी।
सब संतत पर तन मन वारो, चरण केवल लपटाणी।
मीराँ की प्रभु राखि लई है दासी आपणी जाणी।।
राणाजी ने जहर दिया, पर मीराबाई ने इसे प्रभु की इच्छा माना। जैसे आग में तपकर सोना और चमकता है, वैसे ही यह कष्ट भक्ति को निखारता है। लोकलाज, कुल की मर्यादा, संसार की बातें—सब बह गए, प्रभु के प्रेम की वाणी सामने। घर का परदा संभालने को कहा, पर मन तो प्रभु में पागल है। तीर-सा विरह हृदय में गहरे उतरा, मन जैसे प्रेम में डूब गया। तन-मन संतों के चरणों में अर्पित, मीराबाई प्रभु की दासी बनकर उनकी शरण में है। यह प्रेम ऐसा है, जो हर विष को अमृत बना, मन को गिरधर के करीब ले जाता है।
मीरा की भक्ति अडिग, निर्मल और अविचलित है। जब सांसारिक बंधनों और प्रतिकूलताओं ने उसे चुनौती दी, तब उसने ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को और भी दृढ़ बना लिया। विष का प्याला मीरा के लिए कोई भय नहीं था, क्योंकि उसकी आत्मा पहले ही प्रभु के चरणों में समर्पित हो चुकी थी। यह आत्मसमर्पण केवल एक भावनात्मक अवस्था नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक सत्य है—जहाँ भक्त की श्रद्धा उसे प्रत्येक संकट से निर्भीक बना देती है।
कंचन जब अग्नि में तपता है, तब वह और अधिक उज्ज्वल हो जाता है। इसी प्रकार, भक्ति जब परीक्षाओं से गुजरती है, तब वह और अधिक प्रखर और शुद्ध हो जाती है। संसार की लोकलाज, कुल की मान्यता, और सामाजिक प्रतिरोध भी मीरा के संकल्प को डिगा नहीं सके। उसका प्रेम सांसारिक सीमाओं से परे था—एक ऐसा प्रेम, जो केवल कृष्ण की शरण में आत्मा को पूर्ण कर देता है।
यह समर्पण केवल व्यक्तित्व का त्याग नहीं, बल्कि आत्मा का जागरण भी है। जब भक्त स्वयं को प्रभु के चरणों में अर्पित कर देता है, तब उसकी पहचान ईश्वर से ही हो जाती है। मीरा का यह भाव हमें यह सिखाता है कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और निर्भयता से भरे समर्पण का स्वरूप है। जब यह प्रेम जागृत होता है, तब ईश्वर स्वयं अपने भक्त की रक्षा करते हैं, और यही भक्ति का परम सत्य है।
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