गांजा पीनेवाला जन्मको लहरीरे भजन

गांजा पीनेवाला जन्मको लहरीरे मीरा बाई पदावली

गांजा पीनेवाला जन्मको लहरीरे
गांजा पीनेवाला जन्मको लहरीरे॥टेक॥
स्मशानावासी भूषणें भयंकर। पागट जटा शीरीरे॥१॥
व्याघ्रकडासन आसन जयाचें। भस्म दीगांबरधारीरे॥२॥
त्रितिय नेत्रीं अग्नि दुर्धर। विष हें प्राशन करीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभू ध्यानी निरंतर। चरण कमलकी प्यारीरे॥४॥
 
शिव की भक्ति का यह मधुर स्वरूप उनके विविध आयामों को उजागर करता है—वे केवल सृजनहार ही नहीं, बल्कि संहारक भी हैं। उनकी उपस्थिति श्मशान में हो, उनका भस्म से अलंकृत होना, उनका तीसरा नेत्र अग्निमय होना—यह सब केवल बाहरी प्रतीकों तक सीमित नहीं, बल्कि उनके गहन दिव्य स्वरूप की अभिव्यक्ति है।

शिव वह परम योगी हैं जो सांसारिक मोह-माया से परे हैं, जिन्होंने विष को ग्रहण कर लिया, परंतु स्वयं अमृत से भी अधिक कल्याणकारी बन गए। उनके तांडव में केवल संहार नहीं, बल्कि सृष्टि की पुनर्रचना की ऊर्जा भी समाहित है। उनके व्याघ्रकटा आसन, उनकी जटाओं में प्रवाहित गंगा, और उनके शांत ध्यान में वह शक्ति है, जो समस्त विश्व को स्थिर कर सकती है।

मीराँ की भक्ति इसी दिव्यता को पहचानती है। जब साधक ईश्वर के चरणों में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देता है, तब वहाँ कोई अन्य सत्य नहीं रह जाता—सिर्फ प्रभु के चरणों की अखंड स्मृति और उनकी कृपा का अनंत अनुभव। यही भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है, जहाँ श्रद्धा, प्रेम और आत्मसमर्पण एक-दूसरे में पूर्ण रूप से विलीन हो जाते हैं। जब आत्मा इस अनुभूति को पहचान लेती है, तब उसके लिए कोई अन्य सत्य नहीं रह जाता—सिर्फ प्रभु के चरणों की अनवरत स्मृति।
 
वह प्रभु, जो गांजा पीकर संसार की लहरों से परे रहता है, जन्म-मृत्यु के बंधन तोड़ देता है। स्मशान में वास, भस्म से सजा तन, जटाओं का पाग, और बाघंबर का आसन—उसका रूप भयंकर, पर मन को मोह लेता है। तीसरा नेत्र अग्नि-सा दहकता, विष को भी अमृत बना देता। मीराबाई का मन उस ध्यानी के चरणों में रमा, जो निरंतर ध्यान में लीन, भक्तों का सहारा है। यह प्रेम और भक्ति ही है, जो मन को उस परम सत्य तक ले जाती है। 
 
माई मैनें गोविंद लीन्हो मोल॥ध्रु०॥
कोई कहे हलका कोई कहे भारी। लियो है तराजू तोल॥ मा०॥१॥
कोई कहे ससता कोई कहे महेंगा। कोई कहे अनमोल॥ मा०॥२॥
ब्रिंदाबनके जो कुंजगलीनमों। लायों है बजाकै ढोल॥ मा०॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। पुरब जनमके बोल॥ मा०॥४॥

मेरो मन राम-हि-राम रटै।
राम-नाम जप लीजै प्राणी! कोटिक पाप कटै।
जनम-जनम के खत जु पुराने, नामहि‍ लेत फटै।
कनक-कटोरै इमरत भरियो, नामहि लेत नटै।
मीरा के प्रभु हरि अविनासी तन-मन ताहि पटै।

गली तो चारों बंद हुई हैं, मैं हरिसे मिलूँ कैसे जाय।।
ऊंची-नीची राह रपटली, पांव नहीं ठहराय।
सोच सोच पग धरूँ जतन से, बार-बार डिग जाय।।
ऊंचा नीचां महल पिया का म्हांसूँ चढ्यो न जाय।
पिया दूर पथ म्हारो झीणो, सुरत झकोला खाय।।
कोस कोस पर पहरा बैठया, पैग पैग बटमार।
हे बिधना कैसी रच दीनी दूर बसायो लाय।।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर सतगुरु दई बताय।
जुगन-जुगन से बिछड़ी मीरा घर में लीनी लाय।।

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
जाके सिर मोरमुगट मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छांड़ि दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ़ लीन्हीं लोई।
मोती मूंगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई॥
दूधकी मथनियां बड़े प्रेमसे बिलोई।
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
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